राहुल गांधी अमेठी के लिए जब बुधवार को लखनऊ हवाई अड्डे पर उतरे तो उनकी आगवानी करने वाले युवा कांग्रेसी कार्यकर्ता उनसे जो बात कह रहे थे उसमें बार-बार ये बात गूंज रही थी- भैया जी आपको यूपी में ज़्यादा समय देना होगा.
जब ये बात थोड़ी ज़्यादा होने लगी तो राहुल गांधी ने कहा, "आज दोपहर तक ऐसी गोली देता हूं कि सारे रोग दूर हो जाएंगे और आपके अंदर नई एनर्जी आ जाएगी."
उस वक़्त तक लखनऊ से लेकर दिल्ली तक किसी को अंदाज़ा भी नहीं था कि राहुल गांधी ना केवल प्रियंका गांधी को महासचिव बना चुके हैं बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभार सौंपने का फ़ैसला लेकर अमेठी पहुंच रहे हैं.
वैसे, प्रियंका गांधी की राजनीति में आने की सुगबुगहाट, कोई नई बात नहीं है, चाहे वह अमेठी और रायबरेली में चुनाव प्रचार करना रहा हो या फिर राहुल गांधी के पीछे साये की तरह रहना, प्रियंका गांधी इन भूमिकाओं में लगातार नज़र आती रहीं थीं. लेकिन इससे ज़्यादा की भूमिका के लिए वे अनिच्छा जताती रहीं थीं.
लेकिन पिछले साल 13 जुलाई को जब उन्होंने कांग्रेस के सभी विभागों को देख रहे लोगों के साथ वन-टू-वन बैठक लेने के बाद सबसे अगले सौ दिन का एजेंडा पूछा तो ये क़यास लगने लगे थे कि प्रियंका गांधी अब बड़ी भूमिका के लिए तैयार हो चुकी हैं.
कांग्रेस पार्टी को एक उपयुक्त मौक़े का इंतज़ार था, जो तीन राज्यों में सरकार बनाने के बाद आ चुका था, लेकिन वो मौक़ा किस रूप में सामने आना था.
इसको लेकर कोई भी क़यास लगाने से हिचक रहा था. इसकी वजह ये थी कि ये फ़ैसला पार्टी के नेतृत्व संभालने वाले परिवार के अंदर का था.
बहरहाल जब ये फ़ैसला सामने आया तब से उत्तर प्रदेश में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की स्थिति के बारे में वाराणसी से कांग्रेस नेता अजय राय बताते हैं, "कल से लगातार फ़ोन की घंटियां बज रही हैं, युवा और महिला कार्यकर्ता तो ख़ुशी से पागल हो रहे हैं लेकिन मेरे पास ऐसे कार्यकर्ताओं तक के फ़ोन आ रहे हैं जो कमलापति त्रिपाठी के वक़्त तो कांग्रेसी थे और बाद में दूसरी जगहों पर चले गए."
अजय राय ने तो प्रियंका गांधी से वाराणसी से लोकसभा चुनाव लड़ने की अपील भी कर दी है.
उनका दावा है कि प्रियंका गांधी वाराणसी से लड़ीं तो नरेंद्र मोदी को हराने का करिश्मा भी कर दिखाएंगी. हालांकि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के सामने कांग्रेस इतना बड़ा जोख़िम लेगी, इसमें संदेह है.
कमोबेश यूपी के हर इलाक़े से कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में ऐसा उत्साह दिख रहा है लेकिन प्रियंका की एंट्री, राहुल गांधी के लिए राजनीतिक तौर पर कितना मायने रख रही है, इसे उनकी कही तीन बातों में समझा जा सकता है.
राहुल गांधी ने प्रियंका पर प्रतिक्रिया देते हुए जो बातें कहीं हैं, उनमें तीन बातें बेहद अहम हैं-
पहली बात यही है कि हम बीजेपी को रोकेंगे, महागठबंधन से हमारा बैर नहीं है.
ज़ाहिर है राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी-अमित शाह की वापसी को रोकने के लिए अपना पूरा ज़ोर लगा रहे हैं. साथ ही उन्होंने ये भी संकेत दे दिया है कि वे ज़रूरत पड़ने पर महागठबंधन से हाथ भी मिला सकते हैं.
लेकिन इस बयान के राजनीतिक मायने भी हैं. राहुल गांधी ने इससे साफ़ किया है कि बीजेपी को रोकने के लिए वे किसी भी महागठबंधन का हिस्सा बनने को तैयार हैं. और वे गठबंधन से दूर नहीं भाग रहे हैं बल्कि यूपी में महागठबंधन कांग्रेस से दूर भाग रही है.
यह स्थिति अपने समर्थकों के अलावा दूसरे राजनीतिक दलों में राहुल गांधी की स्वीकार्यता को और बढ़ाएगी.
लेकिन इसके बाद राहुल गांधी का दूसरा बयान ज़्यादा अहम है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस अब बैकफुट पर नहीं फ्रंट फुट पर खेलेगी.
साफ़ है कि वे नरेंद्र मोदी को आमने-सामने की चुनौती देते नज़र आ रहे हैं. लेकिन इसके राजनीतिक निहतार्थ महागठबंधन के नेताओं के लिए भी हैं, अगर ज़रूरत पड़ी तो राहुल गांधी अकेले दम पर कांग्रेस को यूपी में खड़ा करने की चुनौती उठाने को तैयार हैं.
हालांकि वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार अंबिकानंद सहाय इसको दूसरी तरह से देखते हैं.
वे कहते हैं, ''2019 की जहां तक बात है तो राहुल गांधी की कोशिश महागठबंधन को चुनौती देने की नहीं होगी क्योंकि उनके सामने नरेंद्र मोदी को हराने की चुनौती है.''
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों की राय में जिस पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी प्रियंका गांधी को बनाया गया है, वो इलाक़ा अब तक समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का इलाक़ा माना जाता रहा है, जिसे 2014 में अमित शाह की सोशल इंजीनियरिंग ने तार-तार कर दिया था.
हालांकि दिलचस्प ये है कि ये इलाक़ा कांग्रेस के लिए भी उतना ही मज़बूत रहा है. 2009 में यूपी में जब कांग्रेस ने 21 सीटें जीती थीं, तब 13 सीटें इसी पूर्वांचल से उसके खाते में आई थीं.
दरअसल, दलितों और मुसलमानों की मौजूदगी के साथ-साथ ब्राह्मणों की बड़ी आबादी इस हिस्से में प्रभावी भूमिका निभाती रही है. प्रियंका के सहारे इस इलाक़े में कांग्रेस अपनी खोई हुई ज़मीन को हासिल करने की कोशिश करेगी.
Thursday, January 24, 2019
Wednesday, January 16, 2019
आरक्षण: निजी शिक्षा संस्थानों में कैसे लागू करेगी सरकार?
9 जनवरी को सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों के लिए केंद्र सरकार की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 10 फ़ीसदी के आरक्षण बिल को संसद के दोनों सदनों से पारित होने के बाद अब राष्ट्रपति से मंजूरी मिल चुकी है.
इसके साथ ही सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों को 10 फ़ीसदी आरक्षण विधेयक ने अब क़ानून का रूप ले लिया है लेकिन मंगलवार को केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने आरक्षण को लेकर एक नया राग छेड़ा है.
उन्होंने देश के प्राइवेट सेक्टर के उच्च शिक्षा संस्थानों में भी इसे लागू करने का इरादा ज़ाहिर किया है.
जावड़ेकर ने कहा, "संसद ने जो 124वां संविधान संशोधन किया. उसके अनुसार मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने फ़ैसला लिया है कि इस वर्ष से, 2019 के सत्र से ही 10 फ़ीसदी आरक्षण लागू होगा. 10 फ़ीसदी आरक्षण आर्थिक आधार पर ग़रीबों के लिए जो किया गया है, और ये करते समय एससी, एसटी, ओबीसी के आरक्षण को बिल्कुल धक्का नहीं लगेगा, वो बरकरार रहेंगे. और ये एडिशनल 10 परसेंट होंगे."
"इसके लिए आज मीटिंग हुई यूजीसी, एआईसीटीई और हमारे अधिकारी के बीच. इसी वर्ष से इसे लागू करने के लिए सभी विश्वविद्यालयों को सूचना दी जाएगी और उनके प्रॉस्पेक्टस में ये डाला जाएगा कि 10 फ़ीसदी आरक्षण, जो अनारक्षित वर्ग है, जिनको आज तक आरक्षण नहीं मिला है, ऐसे वर्गों के छात्रों के लिए 10 फ़ीसदी आरक्षण रहेगा, ये आर्थिक आरक्षण रहेगा, और इसमें निजी संस्थानों में भी आरक्षण लागू रहेगा. 40 हज़ार कॉलेज और 900 विश्वविद्यालयों में ये लागू रहेगा. और इसके लिए ज़्यादा सीटें निर्माण करेंगे."
"आज देश में चार करोड़ छात्र कॉलेज में पढ़ रहे हैं. टेक्नीकल, नॉन टेक्नीकल, मैनेजमेंट, आर्ट, साइंस, कॉमर्स सभी फैकेल्टिज़ में ये आरक्षण लागू होगा. और इसके लिए यूजीसी, एआईसीटीई और मंत्रालय एक हफ़्ते में निकालेंगे. यह बहुत बड़ा फ़ैसला है और इसके लिए संसद को भी हम रिपोर्ट करेंगे."
"10 परसेंट आरक्षण रख कर एससी-एसटी और ओबीसी को बाधित किए बगैर, अभी यदि 100 लोगों को एडमिशन मिल रहा है तो क़रीब 125 लोगों को एडमिशन मिलेगा."
राजनीतिक रूप से जावड़ेकर की यह घोषणा महत्वपूर्ण है क्योंकि जावड़ेकर ने यह स्पष्ट किया कि सीटों को बढ़ाने का फ़ैसला इसलिए किया गया ताकि 10 फ़ीसदी आरक्षण लागू होने के बाद किसी भी वर्ग को पहले से मिल रही सीटों पर कोई असर नहीं पड़े.
वैसे अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को पहले ही 10 फ़ीसदी आरक्षण के दायरे से बाहर रखा गया है.
लेकिन निजी संस्थानों में एक आदेश की बदौलत 10 फ़ीसदी आरक्षण को सरकार कैसे लागू करवाएगी, इसे लेकर असमंजस की स्थिति है.
2009 में पारित शिक्षा के अधिकार क़ानून के तहत आर्थिक रूप से कमज़ोर और उपेक्षित वर्ग के बच्चों के लिए 25 फ़ीसदी सीटें आरक्षित किये जाने का प्रावधान किया था.
केंद्र सरकार बार बार यह कह रही है कि 10 फ़ीसदी आरक्षण के लिए सीटें बढ़ाई जाएंगी. यूजीसी से मान्यता प्राप्त सभी विश्वविद्यालय और शैक्षिक संस्थान चाहे वो सरकारी हो या निजी उन्हें आरक्षण लागू करना होगा.
ऑल इंडिया उच्चतर शिक्षा सर्वेक्षण (ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन या एआईएसएचई) 2018-19 के अनुसार, देश में कुल 950 विश्वविद्यालय, 41748 कॉलेज और 10,510 स्टैंडअलोन शिक्षण संस्थान हैं.
मौजूदा वक्त में भी निजी कॉलेजों में आरक्षण व्यवस्था लागू नहीं है. इससे जुड़े कुछ मामले अदालत में चल रहे हैं.
मीडिया आई ख़बरों के मुताबिक केंद्रीय विश्वविद्यालय, आईआईटी, आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित उच्च शैक्षिक संस्थानों समेत देश भर के शिक्षण संस्थानों में यदि 10 फ़ीसदी आरक्षण देना है तो इसके लिए क़रीब 10 लाख सीटें बढ़ानी होंगी.
इस पर ये कि भारत में कई शिक्षण संस्थानों का वर्तमान ढांचा अपर्याप्त है, उनमें उपकरणों की कमी है और सक्षम शिक्षकों का अभाव है.
इतना ही नहीं निजी कॉलेजों में आरक्षण की व्यवस्था लागू नहीं है और इससे जुड़े कुछ मामले अदालत में चल रहे हैं.
एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी के कार्यकारी अध्यक्ष राहुल कारद ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "इतना बड़ा फ़ैसला लेने से पहले सरकार को निजी संस्थानों से बात करके उन्हें विश्वास में लेना चाहिए था. भारत में निजी संस्थानों ने आधारभूत ढांचे के विकास के लिए काफ़ी ज़्यादा खर्च किया है और उन्हें अपने खर्चों को निकालना है. और उनके ऊपर पहले से काफ़ी भार है. ऐसे में उन पर ये भार नहीं डाला जाना चाहिए."
एक और स्थिति ये है कि, पिछले पांच सालों के दौरान कम होते एडमिशन के चलते अप्रैल 2018 में अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) ने 800 इंजीनियरिंग कॉलेजों को बंद करने का फ़ैसला किया था.
इसके साथ ही सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों को 10 फ़ीसदी आरक्षण विधेयक ने अब क़ानून का रूप ले लिया है लेकिन मंगलवार को केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने आरक्षण को लेकर एक नया राग छेड़ा है.
उन्होंने देश के प्राइवेट सेक्टर के उच्च शिक्षा संस्थानों में भी इसे लागू करने का इरादा ज़ाहिर किया है.
जावड़ेकर ने कहा, "संसद ने जो 124वां संविधान संशोधन किया. उसके अनुसार मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने फ़ैसला लिया है कि इस वर्ष से, 2019 के सत्र से ही 10 फ़ीसदी आरक्षण लागू होगा. 10 फ़ीसदी आरक्षण आर्थिक आधार पर ग़रीबों के लिए जो किया गया है, और ये करते समय एससी, एसटी, ओबीसी के आरक्षण को बिल्कुल धक्का नहीं लगेगा, वो बरकरार रहेंगे. और ये एडिशनल 10 परसेंट होंगे."
"इसके लिए आज मीटिंग हुई यूजीसी, एआईसीटीई और हमारे अधिकारी के बीच. इसी वर्ष से इसे लागू करने के लिए सभी विश्वविद्यालयों को सूचना दी जाएगी और उनके प्रॉस्पेक्टस में ये डाला जाएगा कि 10 फ़ीसदी आरक्षण, जो अनारक्षित वर्ग है, जिनको आज तक आरक्षण नहीं मिला है, ऐसे वर्गों के छात्रों के लिए 10 फ़ीसदी आरक्षण रहेगा, ये आर्थिक आरक्षण रहेगा, और इसमें निजी संस्थानों में भी आरक्षण लागू रहेगा. 40 हज़ार कॉलेज और 900 विश्वविद्यालयों में ये लागू रहेगा. और इसके लिए ज़्यादा सीटें निर्माण करेंगे."
"आज देश में चार करोड़ छात्र कॉलेज में पढ़ रहे हैं. टेक्नीकल, नॉन टेक्नीकल, मैनेजमेंट, आर्ट, साइंस, कॉमर्स सभी फैकेल्टिज़ में ये आरक्षण लागू होगा. और इसके लिए यूजीसी, एआईसीटीई और मंत्रालय एक हफ़्ते में निकालेंगे. यह बहुत बड़ा फ़ैसला है और इसके लिए संसद को भी हम रिपोर्ट करेंगे."
"10 परसेंट आरक्षण रख कर एससी-एसटी और ओबीसी को बाधित किए बगैर, अभी यदि 100 लोगों को एडमिशन मिल रहा है तो क़रीब 125 लोगों को एडमिशन मिलेगा."
राजनीतिक रूप से जावड़ेकर की यह घोषणा महत्वपूर्ण है क्योंकि जावड़ेकर ने यह स्पष्ट किया कि सीटों को बढ़ाने का फ़ैसला इसलिए किया गया ताकि 10 फ़ीसदी आरक्षण लागू होने के बाद किसी भी वर्ग को पहले से मिल रही सीटों पर कोई असर नहीं पड़े.
वैसे अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को पहले ही 10 फ़ीसदी आरक्षण के दायरे से बाहर रखा गया है.
लेकिन निजी संस्थानों में एक आदेश की बदौलत 10 फ़ीसदी आरक्षण को सरकार कैसे लागू करवाएगी, इसे लेकर असमंजस की स्थिति है.
2009 में पारित शिक्षा के अधिकार क़ानून के तहत आर्थिक रूप से कमज़ोर और उपेक्षित वर्ग के बच्चों के लिए 25 फ़ीसदी सीटें आरक्षित किये जाने का प्रावधान किया था.
केंद्र सरकार बार बार यह कह रही है कि 10 फ़ीसदी आरक्षण के लिए सीटें बढ़ाई जाएंगी. यूजीसी से मान्यता प्राप्त सभी विश्वविद्यालय और शैक्षिक संस्थान चाहे वो सरकारी हो या निजी उन्हें आरक्षण लागू करना होगा.
ऑल इंडिया उच्चतर शिक्षा सर्वेक्षण (ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन या एआईएसएचई) 2018-19 के अनुसार, देश में कुल 950 विश्वविद्यालय, 41748 कॉलेज और 10,510 स्टैंडअलोन शिक्षण संस्थान हैं.
मौजूदा वक्त में भी निजी कॉलेजों में आरक्षण व्यवस्था लागू नहीं है. इससे जुड़े कुछ मामले अदालत में चल रहे हैं.
मीडिया आई ख़बरों के मुताबिक केंद्रीय विश्वविद्यालय, आईआईटी, आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित उच्च शैक्षिक संस्थानों समेत देश भर के शिक्षण संस्थानों में यदि 10 फ़ीसदी आरक्षण देना है तो इसके लिए क़रीब 10 लाख सीटें बढ़ानी होंगी.
इस पर ये कि भारत में कई शिक्षण संस्थानों का वर्तमान ढांचा अपर्याप्त है, उनमें उपकरणों की कमी है और सक्षम शिक्षकों का अभाव है.
इतना ही नहीं निजी कॉलेजों में आरक्षण की व्यवस्था लागू नहीं है और इससे जुड़े कुछ मामले अदालत में चल रहे हैं.
एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी के कार्यकारी अध्यक्ष राहुल कारद ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "इतना बड़ा फ़ैसला लेने से पहले सरकार को निजी संस्थानों से बात करके उन्हें विश्वास में लेना चाहिए था. भारत में निजी संस्थानों ने आधारभूत ढांचे के विकास के लिए काफ़ी ज़्यादा खर्च किया है और उन्हें अपने खर्चों को निकालना है. और उनके ऊपर पहले से काफ़ी भार है. ऐसे में उन पर ये भार नहीं डाला जाना चाहिए."
एक और स्थिति ये है कि, पिछले पांच सालों के दौरान कम होते एडमिशन के चलते अप्रैल 2018 में अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) ने 800 इंजीनियरिंग कॉलेजों को बंद करने का फ़ैसला किया था.
Tuesday, January 8, 2019
सामान्य वर्ग को आरक्षण दिए जाने से जुड़े 5 अनसुलझे सवाल?
केंद्र सरकार ने सामान्य वर्ग के ग़रीब और पिछड़े तबके के लोगों को सरकारी नौकरियों में दस फ़ीसदी आरक्षण देने का फ़ैसला किया है. कैबिनेट ने सोमवार को फ़ैसला किया और मंगलवार को बिल लोकसभा में पेश भी कर दिया गया जो कि शीतकालीन सत्र का आख़िरी दिन है.
लेकिन सवाल ये उठता है कि केंद्र सरकार आने वाले दिनों में अपने इस फ़ैसले को अमल में कैसे लाएगी और अगर ये संभव हुआ तो ये आरक्षण किसे और कैसे मिलेगा?
इन्हीं सवालों को जानने के लिए बीबीसी ने बात की कानूनी मामलों के जानकार विराग गुप्ता से.
सवाल - 1 केंद्र सरकार ने चुनाव से ठीक तीन महीने पहले इस फ़ैसले का ऐलान क्यों किया?
जवाब - हाल ही में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में नुकसान होने के बाद भाजपा को महसूस हुआ कि एसएसी-एसटी मामले पर उन्हें जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई के लिए सवर्ण वर्ग को भी आरक्षण का लॉलीपॉप देना चाहिए.
लेकिन मुझे लगता है कि ये सही समाधान नहीं है क्योंकि इससे स्थिति और जटिल होगी. सुप्रीम कोर्ट में जब ये मामला जाएगा तब सरकार की फजीहत होगी. और इससे किसी भी वर्ग को कोई लाभ होने की जगह जातीय विद्वेष में बढ़त होगी.
जवाब - फिलहाल, इस बात पर काफ़ी कयास लगाए जा रहे हैं कि केंद्र सरकार इस फ़ैसले को कानूनी जामा पहना पाएगी या नहीं. मैं मानता हूं कि संसद में इस फ़ैसले से जुड़े विधेयक को पास कराना केंद्र सरकार के लिए बड़ी चुनौती नहीं होगी.
सरकार को ये भली भांति पता है कि राज्यसभा में उसके पास बहुमत नहीं है. लेकिन आज की तारीख़ में आरक्षण समर्थक करने वाले हों या इसके विरोध में खड़े लोग हों, गरीब सवर्णों के आरक्षण का विरोध कौन कर सकता है.
हाल ही में एससी-एसटी मुद्दे पर लाया गया बिल भी ऐसा ही उदाहरण था जब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद बदलाव किया गया था और सभी दलों ने इसका समर्थन किया था.
देखिए, प्रश्न इस बात का है कि सरकार कानून बनाने की प्रक्रिया को लेकर कितनी गंभीर है. कल कैबिनेट में ये फैसला लिया गया और दो दिनों में सरकार इस बिल को पास करना चाहती है तो राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए कानून में बदलाव करने के जो प्रयास हैं, वो संसदीय प्रणाली की गिरावट को दर्शाते हैं.
आने वाले समय में इस तरह कमजोर तरीके से कानूनों में बदलाव किए जाएंगे तो उन्हें निश्चित तौर पर अदालतों में चुनौती मिलेगी.
सुप्रीम कोर्ट ने आज से 26 साल पहले सन 1992 में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित किया था कि अगर सरकार के सामने सामाजिक न्याय और समाज में समानता लाने की मजबूरी है तो वह आरक्षण की व्यवस्था करे लेकिन 50 फीसदी तक की सामान्य लिमिट होनी चाहिए.
इससे बची नौकरियों को आप मैरिट से भरें ताकि प्रशासनिक कार्यकुशलता से किसी तरह का समझौता न किया जाए. ऐसे में सरकार रोजगार के अवसर बढ़ाए जिससे ये संतुलन खराब न हो और आरक्षण की आवश्यकता ही नहीं रहेगी.
ये एक बड़ा सवाल है क्योंकि मुसलमानों और ईसाइयों में जाति प्रथा नहीं होती है. ऐसे में एससी-एसटी, ओबीसी का आरक्षण सामान्यत: उन्हें नहीं मिलता है. हालांकि, कुछ राज्यों में इसके लिए प्रावधान हैं. लेकिन गरीबी तो सब में होती है तो क्या इस वर्ग को इस फ़ैसले का लाभ मिलेगा.
अगर उन्हें मिलता है तो मैं समझता हूं कि संघ परिवार में अड़चनें पैदा होंगी. लेकिन अगर उन्हें नहीं मिलेगा तो अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा जो कि ये बताता है कि कानून के सामने सभी को बराबरी का दर्जा और एक समान अधिकार हासिल हैं.
लेकिन सवाल ये उठता है कि केंद्र सरकार आने वाले दिनों में अपने इस फ़ैसले को अमल में कैसे लाएगी और अगर ये संभव हुआ तो ये आरक्षण किसे और कैसे मिलेगा?
इन्हीं सवालों को जानने के लिए बीबीसी ने बात की कानूनी मामलों के जानकार विराग गुप्ता से.
सवाल - 1 केंद्र सरकार ने चुनाव से ठीक तीन महीने पहले इस फ़ैसले का ऐलान क्यों किया?
जवाब - हाल ही में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में नुकसान होने के बाद भाजपा को महसूस हुआ कि एसएसी-एसटी मामले पर उन्हें जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई के लिए सवर्ण वर्ग को भी आरक्षण का लॉलीपॉप देना चाहिए.
लेकिन मुझे लगता है कि ये सही समाधान नहीं है क्योंकि इससे स्थिति और जटिल होगी. सुप्रीम कोर्ट में जब ये मामला जाएगा तब सरकार की फजीहत होगी. और इससे किसी भी वर्ग को कोई लाभ होने की जगह जातीय विद्वेष में बढ़त होगी.
जवाब - फिलहाल, इस बात पर काफ़ी कयास लगाए जा रहे हैं कि केंद्र सरकार इस फ़ैसले को कानूनी जामा पहना पाएगी या नहीं. मैं मानता हूं कि संसद में इस फ़ैसले से जुड़े विधेयक को पास कराना केंद्र सरकार के लिए बड़ी चुनौती नहीं होगी.
सरकार को ये भली भांति पता है कि राज्यसभा में उसके पास बहुमत नहीं है. लेकिन आज की तारीख़ में आरक्षण समर्थक करने वाले हों या इसके विरोध में खड़े लोग हों, गरीब सवर्णों के आरक्षण का विरोध कौन कर सकता है.
हाल ही में एससी-एसटी मुद्दे पर लाया गया बिल भी ऐसा ही उदाहरण था जब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद बदलाव किया गया था और सभी दलों ने इसका समर्थन किया था.
देखिए, प्रश्न इस बात का है कि सरकार कानून बनाने की प्रक्रिया को लेकर कितनी गंभीर है. कल कैबिनेट में ये फैसला लिया गया और दो दिनों में सरकार इस बिल को पास करना चाहती है तो राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए कानून में बदलाव करने के जो प्रयास हैं, वो संसदीय प्रणाली की गिरावट को दर्शाते हैं.
आने वाले समय में इस तरह कमजोर तरीके से कानूनों में बदलाव किए जाएंगे तो उन्हें निश्चित तौर पर अदालतों में चुनौती मिलेगी.
सुप्रीम कोर्ट ने आज से 26 साल पहले सन 1992 में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित किया था कि अगर सरकार के सामने सामाजिक न्याय और समाज में समानता लाने की मजबूरी है तो वह आरक्षण की व्यवस्था करे लेकिन 50 फीसदी तक की सामान्य लिमिट होनी चाहिए.
इससे बची नौकरियों को आप मैरिट से भरें ताकि प्रशासनिक कार्यकुशलता से किसी तरह का समझौता न किया जाए. ऐसे में सरकार रोजगार के अवसर बढ़ाए जिससे ये संतुलन खराब न हो और आरक्षण की आवश्यकता ही नहीं रहेगी.
ये एक बड़ा सवाल है क्योंकि मुसलमानों और ईसाइयों में जाति प्रथा नहीं होती है. ऐसे में एससी-एसटी, ओबीसी का आरक्षण सामान्यत: उन्हें नहीं मिलता है. हालांकि, कुछ राज्यों में इसके लिए प्रावधान हैं. लेकिन गरीबी तो सब में होती है तो क्या इस वर्ग को इस फ़ैसले का लाभ मिलेगा.
अगर उन्हें मिलता है तो मैं समझता हूं कि संघ परिवार में अड़चनें पैदा होंगी. लेकिन अगर उन्हें नहीं मिलेगा तो अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा जो कि ये बताता है कि कानून के सामने सभी को बराबरी का दर्जा और एक समान अधिकार हासिल हैं.
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