पिछले दिनों देवबंद में जब मायावती, अखिलेश यादव और अजीत सिंह की संयुक्त रैली हुई और जैसे ही अजीत सिंह ने मंच पर चढ़ने की कोशिश की, बीएसपी के एक नेता ने अजीत सिंह से अपने जूते उतारने के लिए कहा. मायावती को ये पसंद नहीं है कि वो जब मंच पर चढ़ें तो उनके अलावा कोई वहां जूते पहने रहे.
अजीत सिंह को अपने जूते उतारने पड़े और तब जा कर उन्हें मंच पर मायावती के साथ खड़े होने का मौक़ा मिल पाया. ये ना सिर्फ़ एक महिला की सफ़ाई के प्रति प्रतिबद्धता, बल्कि संख्या के बल पर देश में निरंतर बदलने वाली सामाजिक सहभागिता के बदलते हुए समीकरणों को भी दर्शाता है.
मायावती के जीवनीकार अजय बोस की मानी जाए तो सफ़ाई के प्रति उनकी इस 'सनक' के पीछे भी एक कहानी है.
अजय बोस 'बहनजी: अ पॉलिटिकल बायोग्राफ़ी ऑफ़ मायावती' में लिखते हैं, ''जब मायावती पहली बार लोकसभा में चुन कर आईं तो उनके तेल लगे बाल और देहाती लिबास तथाकथित सभ्रांत महिला सांसदों के लिए मज़े की चीज़ हुआ करते थे. वो अक्सर शिकायत करती थीं कि मायावती को बहुत पसीना आता है. उनमें से एक ने एक वरिष्ठ महिला सांसद से यहां तक कहा था कि वो मायावती से कहें कि वो अच्छा 'परफ़्यूम' लगा कर सदन में आया करें.''
मायावती के नज़दीकी लोगों के अनुसार बार-बार उनकी जाति का उल्लेख और उनको ये आभास दिलाने की कोशिश कि दलित अक्सर गंदे होते हैं, का उन पर दीर्घकालीन असर पड़ा. उन्होंने हुक्म दिया कि उनके कमरे में कोई भी व्यक्ति वो चाहे जितना बड़ा ही क्यों ना हो, जूता पहन कर नहीं जाएगा.
मायावती की एक और जीवनीकार नेहा दीक्षित ने भी कारवां पत्रिका में उन पर लिखे लेख 'द मिशन - इनसाइड मायावतीज़ बैटल फ़ॉर उत्तर प्रदेश' में लिखा था, ''मायावती में सफ़ाई के लिए इस हद तक जुनून है कि वो अपने घर में दिन में तीन बार पोछा लगवाती हैं.''
मायावती के मिजाज़ के बारे में भविष्यवाणी करना बहुत कठिन है. बात 17 अप्रैल 1999 की है. राष्ट्रपति केआर नारायणन ने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार से लोकसभा में विश्वास मत लेने के लिए कहा था.
सरकार इसके लिए आश्वस्त भी थी, क्योंकि चौटाला एनडीए खेमे में वापस आने का ऐलान कर चुके थे और मायावती की तरफ़ से संकेत आए थे कि उनकी पार्टी मतदान में भाग नहीं लेगी.
उस दिन संसद भवन के पोर्टिको में जब अटल बिहारी वाजपेयी अपनी कार में बैठ रहे थे तो पीछे आ रही मायावती ने चिल्ला कर कहा था 'आपको चिंता करने की ज़रूरत नहीं.'
मतदान से कुछ समय पहले, संसदीय कार्य मंत्री कुमारमंगलम ने बहुजन समाज पार्टी के सांसदों से बात कर कहा, अगर आपने सहयोग किया तो शाम तक मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री हो सकती हैं.
सरकार के खेमे में बढ़ती गतिविधियों को देख कर शरद पवार मायावती के पास पहुंचे. मायावती ने उनसे सीधा सवाल किया, "अगर हम सरकार के ख़िलाफ़ वोट करते हैं तो क्या सरकार गिर जाएगी?"
पवार ने जवाब दिया, "हाँ".
जब बहस के बाद वोटिंग का समय आया तो पूरे सदन में सन्नाटा छाया हुआ था.
मायावती, आरिफ़ मोहम्मद ख़ां और अकबर अहमद डंपी की तरफ़ देख कर गरजीं, 'लाल बटन दबाओ.' ये उस ज़माने की सबसे बड़ी 'राजनीतिक कलाबाज़ी' थी.
जब इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का परिणाम 'फ़्लैश' हुआ तो वाजपेयी सरकार सरकार विश्वास मत खो चुकी थी. मायावती को इस तरह के बड़े फ़ैसले लेने से कभी परहेज़ नहीं रहा है.
हुआ ये थे कि एक दिन पहले दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में 21 साल की मायावती ने उस समय के स्वास्थ्य मंत्री राज नारायण पर ज़बरदस्त हमला बोला था.
राजनारायण अपने भाषण में दलितों को बार-बार 'हरिजन' कहकर संबोधित कर रहे थे. अपनी बारी आने पर मायावती चिल्लाईं, "आप हमें 'हरिजन' कह कर अपमानित कर रहे हैं."
एक दिन बाद रात के 11 बजे किसी ने उनके घर की कुंडी खटखटाई.
जब मायावती के पिता प्रभुदयाल दरवाज़ा खोलने आए तो उन्होंने देखा कि बाहर मुड़े-तुड़े कपड़ों में, गले में मफ़लर डाले, लगभग गंजा हो चला एक अधेड़ शख़्स खड़ा था.
उन्होंने अपना परिचय देते हुए कहा कि वो कांशीराम हैं और 'बामसेफ़' के अध्यक्ष हैं. उन्होंने कहा कि वो मायावती को पुणे में एक भाषण देने के लिए आमंत्रित करने आए हैं.
उस समय मायावती दिल्ली के इंदरपुरी इलाक़े में रहा करती थीं. उनके घर में बिजली नहीं होती थी. वो लालटेन की रोशनी में पढ़ रही थीं.
कांशीराम की जीवनी कांशीराम 'द लीडर ऑफ़ दलित्स' लिखने वाले बद्री नारायण बताते हैं, "कांशीराम ने मायावती से पहला सवाल पूछा कि वो क्या करना चाहती हैं. मायावती ने कहा कि वो आईएएस बनना चाहती हैं ताकि अपने समुदाय के लोगों की सेवा कर सकें."
'कांशीराम ने कहा, "तुम आईएएस बन कर क्या करोगी? मैं तुम्हें एक ऐसा नेता बना सकता हूं जिसके पीछे एक नहीं, दसियों 'कलेक्टरों' की लाइन लगी रहेगी. तुम सही मायने में तब अपने लोगों की सेवा कर पाओगी."
मायावती की समझ में तुरंत आ गया कि उनका भविष्य कहां है. हालांकि उनके पिता इसके सख़्त ख़िलाफ़ थे. इसके बाद मायावती कांशीराम के आंदोलन में शामिल हो गईं.
मायावती अपनी आत्मकथा 'बहुजन आंदोलन की राह में मेरी जीवन संघर्ष गाथा' में लिखती हैं कि एक दिन उनके पिता उन पर चिल्लाए - तुम कांशीराम से मिलना बंद करो और आईएएस की तैयारी फिर से शुरू करो, वरना तुरंत मेरा घर छोड़ दो.
मायावती ने अपने पिता की बात नहीं मानी. उन्होंने अपना घर छोड़ दिया और पार्टी ऑफ़िस में आकर रहने लगीं.
उनकी जीवनी लिखने वाले अजय बोस अपनी किताब 'बहनजी - अ पॉलिटिकल बायोग्राफ़ी' में लिखते हैं, "मायावती ने स्कूल अध्यापिका के तौर पर मिलने वाले वेतन के पैसों को उठाया जिन्हें उन्होंने जोड़ रखा था, एक सूटकेस में कुछ कपड़े भरे और उस घर से बाहर आ गईं जहां वो बड़ी हुई थीं."
कांशीराम की जीवनी 'कांशीराम लीडर ऑफ़ द दलित्स' लिखने वाले बद्री नारायण बताते हैं कि मायावती ने वर्णन किया है कि उस समय उनके क्या संघर्ष थे और लोग उनके बारे में क्या सोचते थे.
एक लड़की का घर छोड़कर अकेले रहना उस समय बहुत बड़ी बात होती थी. वो असल में किराए का एक कमरा लेकर रहना चाहती थीं लेकिन इसके लिए उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं थे. इसलिए पार्टी आफ़िस में रहना उनकी मजबूरी थी. उनके और कांशीराम के बीच बहुत ही अच्छी 'कैमिस्ट्री' थी.
Monday, April 22, 2019
Tuesday, April 16, 2019
क्रिकेट वर्ल्ड कप 2019: ऋषभ पंत बाहर, विजय शंकर अंदर क्यों
मई के आख़िर में इंग्लैंड में शुरू होने जा रहे क्रिकेट वर्ल्ड कप 2019 के लिए टीम इंडिया का ऐलान हो गया है.
टूर्नामेंट के लिए चुनी गई 15 सदस्यों की टीम की घोषणा होते ही जिन खिलाड़ियों के बारे में सबसे ज़्यादा चर्चा हो रही है, वे हैं ऋषभ पंत और विजय शंकर.
कुछ भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों को इस बात पर हैरानी हुई कि बल्ले से लगातार शानदार प्रदर्शन करने के बावजूद विकेटकीपर बल्लेबाज़ ऋषभ पंत को वर्ल्ड कप स्कवायड में जगह नहीं मिली.
टीम में दूसरे विकेटकीपर के तौर पर अनुभवी दिनेश कार्तिक को शामिल किया गया है.
कुछ लोग बल्लेबाज़ी क्रम में चौथे नंबर के लिए ऑलराउंडर विजय शंकर को टीम में शामिल किए जाने को लेकर भी हैरानी जता रहे हैं.
21 साल के ऋषभ पंत के पास दिनेश कार्तिक की तरह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का अधिक अनुभव नहीं है. मगर पिछले कुछ समय से उन्होंने लगातार शानदार प्रदर्शन से क्रिकेट प्रशंसकों और विश्लेषकों को हैरान किया है.
उत्तराखंड से संबंध रखने वाले 21 साल के इस युवा क्रिकेटर ने अंडर 19 क्रिकेट से ही अपनी छाप छोड़ना शुरू कर दिया था. घरेलू क्रिकेट में भी उनका अब तक का रिकॉर्ड शानदार है. रणजी के डेब्यू सीज़न में उन्होंने ट्रिपल सेंचुरी बनाकर सबका ध्यान अपनी ओर खींचा था.
दिल्ली डेयरडेविल्स ने उन्हें आईपीएल-2016 के लिए पंत को 1.9 करोड़ रुपये में खरीदा था जबकि उनका बेस प्राइस 10 लाख ही था. उसके बाद से लगातार आईपीएल के हर सीज़न में उनका प्रदर्शन शानदार रहा है.
अंतरराष्ट्रीय करियर की बात करें तो वह नौ टेस्ट मैच, पांच वनडे और 15 टी-20 खेल चुके हैं. वनडे में भले ही वह बल्ले से कुछ ख़ास नहीं कर पाए मगर टेस्ट में उन्होंने दो शतक लगाए हैं- एक इंग्लैंड में, दूसरा ऑस्ट्रेलिया में.
वरिष्ठ खेल पत्रकार विजय लोकपल्ली कहते हैं कि बहुत से लोगों को ऋषभ के न चुने जाने से हैरानी बेशक हो रही होगी मगर चयनकर्ताओं ने अनुभव को देखते हुए उनकी जगह दिनेश कार्तिक का चयन किया.
वह कहते हैं, "लोगों को हैरानी इसलिए होगी कि ऋषभ ने इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में शतक जमाया था जबकि दिनेश कार्तिक वनडे स्कवायड में भी नहीं थे. मगर मेरा मानना है कि जो अनुभव दिनेश कार्तिक के पास है, वो पंत के पास नहीं है. हालांकि इसमें पंत की ग़लती नहीं है क्योंकि उन्होंने अभी खेलना शुरू किया है."
दिनेश कार्तिक के पास 91 वनडे मैचों का अनुभव है जिसमें उन्होंने 31 की औसत से 1738 रन बनाए हैं. वह 26 टेस्ट और 32 इंटनेशनल टी-20 मैच भी खेल चुके हैं.
विजय लोकपल्ली का मानना है कि चूंकि इंग्लैंड में गेंद बहुत सीम और स्विंग होता है, विकेट के पीछे कैच बहुत तेज़ और साइड में आते हैं, इसी कारण चयनकर्ताओं को लगा होगा कि ऐसी मुश्किल स्थिति में अच्छा विकेट कीपर होना ज़रूरी है. वह कहते हैं, "यहां दिनेश कार्तिक का पलड़ा भारी था क्योंकि ऋषभ पंत की कीपिंग खराब रही थी. कार्तिक स्पिनर के सामने भी पंत से अच्छी कीपिंग करते हैं."
दिनेश कार्तिक ने अच्छे फ़िनिशर के तौर पर भी पहचान बनाई है. मगर वर्ल्ड कप के लिए टीम में शामिल दूसरे विकेटकीपर-बल्लेबाज़ को खेलने का मौक़ा तभी मिलेगा जब महेंद्र सिंह धोनी किसी मैच में खेल नहीं पाएंगे. ऐसा तभी हो सकता है जब वह बीमार या अनफ़िट होने के कारण किसी मैच में न खेल पाएं.
वरिष्ठ खेल पत्रकार जी. राजारमण का मानना है कि उन्हें नहीं लगता कि दूसरे विकेटकीपर को खेलने का मौक़ा मिल पाएगा, ऐसे में बेहतर होता कि ऋषभ पंत को वर्ल्ड कप के हिसाब से ग्रूम करने का मौक़ा दिया जाता.
उन्होंने कहा, "ऋषभ को वर्ल्ड कप टीम में शामिल किए जाने से हैरान तो हूं लेकिन ऐसा क्यों किया, समझ में आता है. शायद चयनकर्ता दिनेश कार्तिक के अनुभव के साथ गए. लेकिन मेरा मानना है कि दिनेश कार्तिक को एक भी मैच खेलने का मौक़ा नहीं मिलेगा. इसलिए एक मौक़ा था ऋषभ पंत को ग्रूम करने का. उन्हें ये समझाने का कि वर्ल्ड कप का माहौल कैसा होता है, वहां कैसी परिस्थितियां होती हैं. अफ़सोस कि चयनकर्ताओं की सोच अलग रही."
जी. राजारमण मानते हैं कि अतिरिक्त विकेटकीपर ले जाने के बजाय ज़रूरत पड़ने पर केएल राहुल से भी विकेटकीपिंग करवाई जा सकती थी, जिस तरह से राहुल द्रविड़ ने 2003 के वर्ल्ड कप में की थी.
विजय शंकर का चयन क्यों
वर्ल्ड कप टीम में नंबर चार पर बल्लेबाज़ी करने वाले खिलाड़ी के लिए अंबाती रायुडू और ऑलराउंडर विजय शंकर के बीच मुक़ाबला था, जिसमें विजयशंकर ने बाज़ी मारी.
28 साल के विजय शंकर मध्यम क्रम के बल्लेबाज़ हैं और दाएं हाथ से मीडियम पेस गेंदबाज़ी करते हैं. उन्होंने तमिलनाडु की ओर से घरेलू क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन करते हुए अपना ध्यान खींचा.
उन्होंने इसी साल जनवरी में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ टेस्ट मैच में इंटरनेशनल डेब्यू किया था. अब वह नौ वनडे और नौ ही इंटरनैशनल टी-20 मैच खेल चुके हैं.
उनके सामने चौथे नंबर के लिए अंबाती रायुडू को माना जा रहा था जो उनसे कहीं ज़्यादा अनुभव रखते हैं. रायुडू 55 वनडे खेल चुके हैं जिनमें उन्होंने 47.05 की औसत से 1694 रन बनाए हैं.
वरिष्ठ खेल पत्रकार विजय लोकपल्ली का कहना है कि विजय शंकर प्रतिभाशाली खिलाड़ी हैं और उपयुक्त चुनाव है. उनका मानना है कि आने वाले समय में विजय शंकर के खेल बारे में बहुत कुछ सुनने को मिलेगा.
उन्होंने कहा, "घरेलू क्रिकेट में उनका प्रदर्शन शानदार रहा है. उनकी बल्लेबाज़ी तो अच्छी है ही, गेंदबाज़ी भी बेहतरीन करते हैं. वह कमाल के फ़ील्डर भी हैं. वे कहीं पर फ़ील्डिंग कर सकते हैं और किसी भी नंबर पर बल्लेबाज़ी कर सकते हैं. टीम इंडिया की नंबर चार की खोज विजय शंकर पर आकर ख़त्म हुई है. उनके अंदर प्रतिभा है, संयम है और यंग खिलाड़ी हैं. सिलेक्टर्स ने उन्हें नज़दीक से देखा है."
वरिष्ठ पत्रकार जी. राजारमण का भी मानना है कि विजय शंकर के रहने से टीम को फ़ायदा होगा.
वह कहते हैं, "विजय शंकर बहुत ही होनहार खिलाड़ी हैं, उनसे पास लाजवाब प्रतिभा है. शायद आलोचकों ने देखा नहीं होगा कि वह ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में कैसे खेले. जिस तरह से वह बॉल को टाइम करते हैं, गेम को समझते हैं, उससे टीम को फ़ायदा ही होगा. दूसरे वह ऑलराउंडर हैं जिसकी टीम में कमी है. वह ऐसे ऑलराउंडर हैं जो तेज़ गेंदबाज़ी करते हैं. हालांकि वह ज़्यादातर बल्लेबाज़ के रूप में ही खेलेंगे."
टूर्नामेंट के लिए चुनी गई 15 सदस्यों की टीम की घोषणा होते ही जिन खिलाड़ियों के बारे में सबसे ज़्यादा चर्चा हो रही है, वे हैं ऋषभ पंत और विजय शंकर.
कुछ भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों को इस बात पर हैरानी हुई कि बल्ले से लगातार शानदार प्रदर्शन करने के बावजूद विकेटकीपर बल्लेबाज़ ऋषभ पंत को वर्ल्ड कप स्कवायड में जगह नहीं मिली.
टीम में दूसरे विकेटकीपर के तौर पर अनुभवी दिनेश कार्तिक को शामिल किया गया है.
कुछ लोग बल्लेबाज़ी क्रम में चौथे नंबर के लिए ऑलराउंडर विजय शंकर को टीम में शामिल किए जाने को लेकर भी हैरानी जता रहे हैं.
21 साल के ऋषभ पंत के पास दिनेश कार्तिक की तरह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का अधिक अनुभव नहीं है. मगर पिछले कुछ समय से उन्होंने लगातार शानदार प्रदर्शन से क्रिकेट प्रशंसकों और विश्लेषकों को हैरान किया है.
उत्तराखंड से संबंध रखने वाले 21 साल के इस युवा क्रिकेटर ने अंडर 19 क्रिकेट से ही अपनी छाप छोड़ना शुरू कर दिया था. घरेलू क्रिकेट में भी उनका अब तक का रिकॉर्ड शानदार है. रणजी के डेब्यू सीज़न में उन्होंने ट्रिपल सेंचुरी बनाकर सबका ध्यान अपनी ओर खींचा था.
दिल्ली डेयरडेविल्स ने उन्हें आईपीएल-2016 के लिए पंत को 1.9 करोड़ रुपये में खरीदा था जबकि उनका बेस प्राइस 10 लाख ही था. उसके बाद से लगातार आईपीएल के हर सीज़न में उनका प्रदर्शन शानदार रहा है.
अंतरराष्ट्रीय करियर की बात करें तो वह नौ टेस्ट मैच, पांच वनडे और 15 टी-20 खेल चुके हैं. वनडे में भले ही वह बल्ले से कुछ ख़ास नहीं कर पाए मगर टेस्ट में उन्होंने दो शतक लगाए हैं- एक इंग्लैंड में, दूसरा ऑस्ट्रेलिया में.
वरिष्ठ खेल पत्रकार विजय लोकपल्ली कहते हैं कि बहुत से लोगों को ऋषभ के न चुने जाने से हैरानी बेशक हो रही होगी मगर चयनकर्ताओं ने अनुभव को देखते हुए उनकी जगह दिनेश कार्तिक का चयन किया.
वह कहते हैं, "लोगों को हैरानी इसलिए होगी कि ऋषभ ने इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में शतक जमाया था जबकि दिनेश कार्तिक वनडे स्कवायड में भी नहीं थे. मगर मेरा मानना है कि जो अनुभव दिनेश कार्तिक के पास है, वो पंत के पास नहीं है. हालांकि इसमें पंत की ग़लती नहीं है क्योंकि उन्होंने अभी खेलना शुरू किया है."
दिनेश कार्तिक के पास 91 वनडे मैचों का अनुभव है जिसमें उन्होंने 31 की औसत से 1738 रन बनाए हैं. वह 26 टेस्ट और 32 इंटनेशनल टी-20 मैच भी खेल चुके हैं.
विजय लोकपल्ली का मानना है कि चूंकि इंग्लैंड में गेंद बहुत सीम और स्विंग होता है, विकेट के पीछे कैच बहुत तेज़ और साइड में आते हैं, इसी कारण चयनकर्ताओं को लगा होगा कि ऐसी मुश्किल स्थिति में अच्छा विकेट कीपर होना ज़रूरी है. वह कहते हैं, "यहां दिनेश कार्तिक का पलड़ा भारी था क्योंकि ऋषभ पंत की कीपिंग खराब रही थी. कार्तिक स्पिनर के सामने भी पंत से अच्छी कीपिंग करते हैं."
दिनेश कार्तिक ने अच्छे फ़िनिशर के तौर पर भी पहचान बनाई है. मगर वर्ल्ड कप के लिए टीम में शामिल दूसरे विकेटकीपर-बल्लेबाज़ को खेलने का मौक़ा तभी मिलेगा जब महेंद्र सिंह धोनी किसी मैच में खेल नहीं पाएंगे. ऐसा तभी हो सकता है जब वह बीमार या अनफ़िट होने के कारण किसी मैच में न खेल पाएं.
वरिष्ठ खेल पत्रकार जी. राजारमण का मानना है कि उन्हें नहीं लगता कि दूसरे विकेटकीपर को खेलने का मौक़ा मिल पाएगा, ऐसे में बेहतर होता कि ऋषभ पंत को वर्ल्ड कप के हिसाब से ग्रूम करने का मौक़ा दिया जाता.
उन्होंने कहा, "ऋषभ को वर्ल्ड कप टीम में शामिल किए जाने से हैरान तो हूं लेकिन ऐसा क्यों किया, समझ में आता है. शायद चयनकर्ता दिनेश कार्तिक के अनुभव के साथ गए. लेकिन मेरा मानना है कि दिनेश कार्तिक को एक भी मैच खेलने का मौक़ा नहीं मिलेगा. इसलिए एक मौक़ा था ऋषभ पंत को ग्रूम करने का. उन्हें ये समझाने का कि वर्ल्ड कप का माहौल कैसा होता है, वहां कैसी परिस्थितियां होती हैं. अफ़सोस कि चयनकर्ताओं की सोच अलग रही."
जी. राजारमण मानते हैं कि अतिरिक्त विकेटकीपर ले जाने के बजाय ज़रूरत पड़ने पर केएल राहुल से भी विकेटकीपिंग करवाई जा सकती थी, जिस तरह से राहुल द्रविड़ ने 2003 के वर्ल्ड कप में की थी.
विजय शंकर का चयन क्यों
वर्ल्ड कप टीम में नंबर चार पर बल्लेबाज़ी करने वाले खिलाड़ी के लिए अंबाती रायुडू और ऑलराउंडर विजय शंकर के बीच मुक़ाबला था, जिसमें विजयशंकर ने बाज़ी मारी.
28 साल के विजय शंकर मध्यम क्रम के बल्लेबाज़ हैं और दाएं हाथ से मीडियम पेस गेंदबाज़ी करते हैं. उन्होंने तमिलनाडु की ओर से घरेलू क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन करते हुए अपना ध्यान खींचा.
उन्होंने इसी साल जनवरी में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ टेस्ट मैच में इंटरनेशनल डेब्यू किया था. अब वह नौ वनडे और नौ ही इंटरनैशनल टी-20 मैच खेल चुके हैं.
उनके सामने चौथे नंबर के लिए अंबाती रायुडू को माना जा रहा था जो उनसे कहीं ज़्यादा अनुभव रखते हैं. रायुडू 55 वनडे खेल चुके हैं जिनमें उन्होंने 47.05 की औसत से 1694 रन बनाए हैं.
वरिष्ठ खेल पत्रकार विजय लोकपल्ली का कहना है कि विजय शंकर प्रतिभाशाली खिलाड़ी हैं और उपयुक्त चुनाव है. उनका मानना है कि आने वाले समय में विजय शंकर के खेल बारे में बहुत कुछ सुनने को मिलेगा.
उन्होंने कहा, "घरेलू क्रिकेट में उनका प्रदर्शन शानदार रहा है. उनकी बल्लेबाज़ी तो अच्छी है ही, गेंदबाज़ी भी बेहतरीन करते हैं. वह कमाल के फ़ील्डर भी हैं. वे कहीं पर फ़ील्डिंग कर सकते हैं और किसी भी नंबर पर बल्लेबाज़ी कर सकते हैं. टीम इंडिया की नंबर चार की खोज विजय शंकर पर आकर ख़त्म हुई है. उनके अंदर प्रतिभा है, संयम है और यंग खिलाड़ी हैं. सिलेक्टर्स ने उन्हें नज़दीक से देखा है."
वरिष्ठ पत्रकार जी. राजारमण का भी मानना है कि विजय शंकर के रहने से टीम को फ़ायदा होगा.
वह कहते हैं, "विजय शंकर बहुत ही होनहार खिलाड़ी हैं, उनसे पास लाजवाब प्रतिभा है. शायद आलोचकों ने देखा नहीं होगा कि वह ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में कैसे खेले. जिस तरह से वह बॉल को टाइम करते हैं, गेम को समझते हैं, उससे टीम को फ़ायदा ही होगा. दूसरे वह ऑलराउंडर हैं जिसकी टीम में कमी है. वह ऐसे ऑलराउंडर हैं जो तेज़ गेंदबाज़ी करते हैं. हालांकि वह ज़्यादातर बल्लेबाज़ के रूप में ही खेलेंगे."
Tuesday, April 9, 2019
ईरानी सेना के रिवॉल्युशनरी गार्ड को अमरीका ने आतंकी संगठन घोषित किया
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने ईरान के रिवॉल्युशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) को विदेशी आतंकी संगठन घोषित कर दिया है. यह पहली बार है जब अमरीका ने किसी और देश की सेना को आतंकी संगठन क़रार दिया है.
व्हाइट हाउस का कहना है कि आईआरजीसी का मतलब है 'इंप्लिमेंटिंग इट्स ग्लोबल टेररिस्ट कैंपेन' है. ट्रंप ने जब से ईरान के साथ अंतरराष्ट्रीय परमाणु क़रार तोड़ा है तब से दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा हुआ है.
अमरीका आईआरजीसी और इससे जुड़े संस्थानों पर पहले से ही आतंकवाद को समर्थन देने और मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाता रहा है. राष्ट्रपति ट्रंप ने सोमवार को जारी अपने बयान में कहा है, ''विदेश मंत्रालय का यह बहुत ही बड़ा फ़ैसला है. ईरान न केवल आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है बल्कि आईआरजीसी इसमें सक्रिय रूप से शामिल है.''
ट्रंप ने कहा कि ईरान पर इससे जबर्दस्त दबाव बनेगा. राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, ''अगर आप आईआरजीसी के साथ संबध रखते हैं तो आप आतंकवाद का समर्थन कर रहे हैं.''
अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने कहा है कि इसके प्रभाव में आने में एक हफ़्ते का वक़्त लगेगा. पॉम्पियो ने कहा कि जब तक ईरान एक समान्य देश की तरह व्यवहार करना शुरू नहीं कर देगा तब तक प्रतिबंध और दबाव की रणनीति जारी रहेगी.
अमरीकी विदेश मंत्री ने कहा, ''ईरान के नेता क्रांतिकारी नहीं हैं. यहां की जनता बेहतर ज़िदगी चाहती है. ये नेता मौक़ापरस्त हैं. हमलोग यहां को लोगों को मदद करते रहेंगे.''
साल 1979 की ईरानी क्रांति के बाद मुल्क में रिवॉल्युशनरी गार्ड का गठन किया गया था. ये ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खुमैनी का फ़ैसला था.
रिवॉल्युशनरी गार्ड का मक़सद नई हुकूमत की हिफ़ाज़त और आर्मी के साथ सत्ता संतुलन बनाना था. ईरान में शाह के पतन के बाद हुकूमत में आई सरकार को ये लगा कि उन्हें एक ऐसी फ़ौज की ज़रूरत है जो नए निजाम और क्रांति के मक़सद की हिफाज़त कर सके.
ईरान के मौलवियों ने एक नए क़ानून का मसौदा तैयार किया जिसमें नियमित आर्मी को देश की सरहद और आंतरिक सुरक्षा का जिम्मा दिया गया और रिवॉल्यूशनरी गार्ड को निज़ाम की हिफाज़त का काम दिया गया.
लेकिन जमीन पर दोनों सेनाएं एक दूसरे के रास्ते में आती रही हैं. उदाहरण के लिए रिवॉल्युशनरी गार्ड क़ानून और व्यवस्था लागू करने में भी मदद करती हैं और आर्मी, नौसेना और वायुसेना को लगातार उसका सहारा मिलता रहा है.
वक़्त के साथ-साथ रिवॉल्युशनरी गार्ड ईरान की फ़ौजी, सियासी और आर्थिक ताक़त बन गई. रिवॉल्युशनरी गार्ड के मौजूदा कमांडर-इन-चीफ़ मोहम्मद अली जाफ़री ने हर उस काम को बख़ूबी अंजाम दिया है जो ईरानी के सुप्रीम लीडर ने उन्हें सौंपा.
ईरान की वॉलंटियर आर्मी बासिज फ़ोर्स के रिवॉल्युशनरी गार्ड से विलय के बाद मोहम्मद अली जाफ़री ने कहा था, ''सुप्रीम लीडर के हुक्म पर रिवॉल्युशनरी गार्ड की रणनीति में कुछ बदलाव किए गए हैं. अब हमारा काम घर में मौजूद दुश्मनों के ख़तरों से निपटना और बाहरी चुनौतियों से मुकाबले में सेना की मदद करना है.''
माना जाता है कि रिवॉल्यgशनरी गार्ड में फ़िलहाल सवा लाख जवान हैं. इनमें ज़मीनी जंग लड़ने वाले सैनिक, नौसैना, हवाई दस्ते हैं और ईरान के रणनीतिक हथियारों की निगरानी का काम भी इन्हीं के जिम्मे हैं.
इसके इतर बासिज एक वॉलंटियर फ़ोर्स है जिसमें क़रीब 90 हज़ार मर्द और औरतें शामिल हैं. इतना ही नहीं बासिज फोर्स ज़रूरत पड़ने पर दस लाख वॉलंटियर्स को इकट्ठा करने का माद्दा भी रखती है. बासिज का पहला काम ये है कि देश के भीतर सरकार विरोधी गतिविधियों से निपटना है.
साल 2009 में जब अहमदीनेजाद के राष्ट्रपति चुनाव जीतने की ख़बर आई तो सड़कों पर विरोध भड़क उठा था. बासिज फ़ोर्स ने दूसरे उम्मीदवार मीर हसन मुसावी के समर्थकों को दबाने के लिए पूरी ताक़त झोंक दी.
बासिज फ़ोर्स क़ानून लागू करने का भी काम करता है और अपने कैडर को भी तैयार रखता है.
ये रिवॉल्यूशनरी गार्ड की स्पेशल आर्मी है. क़ुड्स फ़ोर्स विदेशी ज़मीन पर संवेदनशील मिशन को अंजाम देता है. हिज़्बुल्लाह और इराक़ के शिया लड़ाकों जैसे ईरान के करीबी सशस्त्र गुटों हथियार और ट्रेनिंग देने का काम भी क़ुड्स फोर्स का ही है.
क़ुड्स फोर्स के कमांडर जनरल क़सीम सुलेमानी को ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामनेई ने 'अमर शहीद' का खिताब दिया है. जनरल क़सीम सुलेमानी ने यमन से लेकर सीरिया तक और इराक़ से लेकर दूसरे मुल्कों तक रिश्तों का एक मज़बूत नेटवर्क तैयार किया है ताकि इन देशों में ईरान का असर बढ़ाया जा सके.
सीरिया में शिया लड़ाकों ने मोर्चा खोल रखा है तो इराक़ में वे इस्लामिक स्टेट के खिलाफ लड़ रहे हैं.
रिवॉल्युशनरी गार्ड की कमान ईरान के सुप्रीम लीडर के हाथ में है. सुप्रीम लीडर देश के सशस्त्र बलों के सुप्रीम कमांडर भी हैं. वे इसके अहम पदों पर अपने पुराने सियासी साथियों की नियुक्ति करते हैं ताकि रिवॉल्युशनरी गार्ड पर उनकी कमान मज़बूत बनी रहे.
माना जाता है कि रिवॉल्युशनरी गार्ड ईरान की अर्थव्यवस्था के एक तिहाई हिस्से को नियंत्रित करता है. अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रही कई चैरिटी संस्थानों और कंपनियों पर उसका नियंत्रण है.
ईरानी तेल निगम और इमाम रज़ा की दरगाह के बाद रिवॉल्युशनरी गार्ड मुल्क का तीसरा सबसे धनी संगठन है. इसके दम पर रिवॉल्युशनरी गार्ड अच्छी सैलरी पर धार्मिक नौजवानों की नियुक्ति की जाती है.
भले ही रिवॉल्युशनरी गार्ड में सैनिकों की संख्या नियमित आर्मी से ज़्यादा नहीं है लेकिन ईरान की सबसे ताक़तवर फ़ौज के तौर पर जाना जाता है. यह देश ही नहीं बल्कि मुल्क के बाहर भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाता है.
सीरिया में लड़ाई के दौरान रिवॉल्युशनरी गार्ड के कई कमांडर मारे गए. ये भी कहा जाता है कि दुनिया भर में ईरान के दूतावासों में रिवॉल्युशनरी गार्ड के जवान ख़ुफ़िया कामों के लिए तैनात किए जाते हैं. ये विदेशों में ईरान के समर्थक सशस्त्र गुटों को हथियार और ट्रेनिंग मुहैया कराते हैं.
व्हाइट हाउस का कहना है कि आईआरजीसी का मतलब है 'इंप्लिमेंटिंग इट्स ग्लोबल टेररिस्ट कैंपेन' है. ट्रंप ने जब से ईरान के साथ अंतरराष्ट्रीय परमाणु क़रार तोड़ा है तब से दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा हुआ है.
अमरीका आईआरजीसी और इससे जुड़े संस्थानों पर पहले से ही आतंकवाद को समर्थन देने और मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाता रहा है. राष्ट्रपति ट्रंप ने सोमवार को जारी अपने बयान में कहा है, ''विदेश मंत्रालय का यह बहुत ही बड़ा फ़ैसला है. ईरान न केवल आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है बल्कि आईआरजीसी इसमें सक्रिय रूप से शामिल है.''
ट्रंप ने कहा कि ईरान पर इससे जबर्दस्त दबाव बनेगा. राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, ''अगर आप आईआरजीसी के साथ संबध रखते हैं तो आप आतंकवाद का समर्थन कर रहे हैं.''
अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने कहा है कि इसके प्रभाव में आने में एक हफ़्ते का वक़्त लगेगा. पॉम्पियो ने कहा कि जब तक ईरान एक समान्य देश की तरह व्यवहार करना शुरू नहीं कर देगा तब तक प्रतिबंध और दबाव की रणनीति जारी रहेगी.
अमरीकी विदेश मंत्री ने कहा, ''ईरान के नेता क्रांतिकारी नहीं हैं. यहां की जनता बेहतर ज़िदगी चाहती है. ये नेता मौक़ापरस्त हैं. हमलोग यहां को लोगों को मदद करते रहेंगे.''
साल 1979 की ईरानी क्रांति के बाद मुल्क में रिवॉल्युशनरी गार्ड का गठन किया गया था. ये ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खुमैनी का फ़ैसला था.
रिवॉल्युशनरी गार्ड का मक़सद नई हुकूमत की हिफ़ाज़त और आर्मी के साथ सत्ता संतुलन बनाना था. ईरान में शाह के पतन के बाद हुकूमत में आई सरकार को ये लगा कि उन्हें एक ऐसी फ़ौज की ज़रूरत है जो नए निजाम और क्रांति के मक़सद की हिफाज़त कर सके.
ईरान के मौलवियों ने एक नए क़ानून का मसौदा तैयार किया जिसमें नियमित आर्मी को देश की सरहद और आंतरिक सुरक्षा का जिम्मा दिया गया और रिवॉल्यूशनरी गार्ड को निज़ाम की हिफाज़त का काम दिया गया.
लेकिन जमीन पर दोनों सेनाएं एक दूसरे के रास्ते में आती रही हैं. उदाहरण के लिए रिवॉल्युशनरी गार्ड क़ानून और व्यवस्था लागू करने में भी मदद करती हैं और आर्मी, नौसेना और वायुसेना को लगातार उसका सहारा मिलता रहा है.
वक़्त के साथ-साथ रिवॉल्युशनरी गार्ड ईरान की फ़ौजी, सियासी और आर्थिक ताक़त बन गई. रिवॉल्युशनरी गार्ड के मौजूदा कमांडर-इन-चीफ़ मोहम्मद अली जाफ़री ने हर उस काम को बख़ूबी अंजाम दिया है जो ईरानी के सुप्रीम लीडर ने उन्हें सौंपा.
ईरान की वॉलंटियर आर्मी बासिज फ़ोर्स के रिवॉल्युशनरी गार्ड से विलय के बाद मोहम्मद अली जाफ़री ने कहा था, ''सुप्रीम लीडर के हुक्म पर रिवॉल्युशनरी गार्ड की रणनीति में कुछ बदलाव किए गए हैं. अब हमारा काम घर में मौजूद दुश्मनों के ख़तरों से निपटना और बाहरी चुनौतियों से मुकाबले में सेना की मदद करना है.''
माना जाता है कि रिवॉल्यgशनरी गार्ड में फ़िलहाल सवा लाख जवान हैं. इनमें ज़मीनी जंग लड़ने वाले सैनिक, नौसैना, हवाई दस्ते हैं और ईरान के रणनीतिक हथियारों की निगरानी का काम भी इन्हीं के जिम्मे हैं.
इसके इतर बासिज एक वॉलंटियर फ़ोर्स है जिसमें क़रीब 90 हज़ार मर्द और औरतें शामिल हैं. इतना ही नहीं बासिज फोर्स ज़रूरत पड़ने पर दस लाख वॉलंटियर्स को इकट्ठा करने का माद्दा भी रखती है. बासिज का पहला काम ये है कि देश के भीतर सरकार विरोधी गतिविधियों से निपटना है.
साल 2009 में जब अहमदीनेजाद के राष्ट्रपति चुनाव जीतने की ख़बर आई तो सड़कों पर विरोध भड़क उठा था. बासिज फ़ोर्स ने दूसरे उम्मीदवार मीर हसन मुसावी के समर्थकों को दबाने के लिए पूरी ताक़त झोंक दी.
बासिज फ़ोर्स क़ानून लागू करने का भी काम करता है और अपने कैडर को भी तैयार रखता है.
ये रिवॉल्यूशनरी गार्ड की स्पेशल आर्मी है. क़ुड्स फ़ोर्स विदेशी ज़मीन पर संवेदनशील मिशन को अंजाम देता है. हिज़्बुल्लाह और इराक़ के शिया लड़ाकों जैसे ईरान के करीबी सशस्त्र गुटों हथियार और ट्रेनिंग देने का काम भी क़ुड्स फोर्स का ही है.
क़ुड्स फोर्स के कमांडर जनरल क़सीम सुलेमानी को ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामनेई ने 'अमर शहीद' का खिताब दिया है. जनरल क़सीम सुलेमानी ने यमन से लेकर सीरिया तक और इराक़ से लेकर दूसरे मुल्कों तक रिश्तों का एक मज़बूत नेटवर्क तैयार किया है ताकि इन देशों में ईरान का असर बढ़ाया जा सके.
सीरिया में शिया लड़ाकों ने मोर्चा खोल रखा है तो इराक़ में वे इस्लामिक स्टेट के खिलाफ लड़ रहे हैं.
रिवॉल्युशनरी गार्ड की कमान ईरान के सुप्रीम लीडर के हाथ में है. सुप्रीम लीडर देश के सशस्त्र बलों के सुप्रीम कमांडर भी हैं. वे इसके अहम पदों पर अपने पुराने सियासी साथियों की नियुक्ति करते हैं ताकि रिवॉल्युशनरी गार्ड पर उनकी कमान मज़बूत बनी रहे.
माना जाता है कि रिवॉल्युशनरी गार्ड ईरान की अर्थव्यवस्था के एक तिहाई हिस्से को नियंत्रित करता है. अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रही कई चैरिटी संस्थानों और कंपनियों पर उसका नियंत्रण है.
ईरानी तेल निगम और इमाम रज़ा की दरगाह के बाद रिवॉल्युशनरी गार्ड मुल्क का तीसरा सबसे धनी संगठन है. इसके दम पर रिवॉल्युशनरी गार्ड अच्छी सैलरी पर धार्मिक नौजवानों की नियुक्ति की जाती है.
भले ही रिवॉल्युशनरी गार्ड में सैनिकों की संख्या नियमित आर्मी से ज़्यादा नहीं है लेकिन ईरान की सबसे ताक़तवर फ़ौज के तौर पर जाना जाता है. यह देश ही नहीं बल्कि मुल्क के बाहर भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाता है.
सीरिया में लड़ाई के दौरान रिवॉल्युशनरी गार्ड के कई कमांडर मारे गए. ये भी कहा जाता है कि दुनिया भर में ईरान के दूतावासों में रिवॉल्युशनरी गार्ड के जवान ख़ुफ़िया कामों के लिए तैनात किए जाते हैं. ये विदेशों में ईरान के समर्थक सशस्त्र गुटों को हथियार और ट्रेनिंग मुहैया कराते हैं.
Monday, April 1, 2019
IPL2019: धोनी का प्रहार और ब्रावो-ताहिर की धार से चेन्नई ने लगाई जीत की हैट्रिक
आईपीएल-12 में चेन्नई सुपर किंग्स ने उसी तरह से शुरुआती कामयाबी का सिलसिला बरक़रार रखा है, जैसा उसने पिछली बार किया था और जिस वजह से वह चैंपियन बनी थी.
गत चैंपियन चेन्नई ने रविवार को अपने ही घर में खेलते हुए राजस्थान रॉयल्स को आठ रन से हरा दिया.
राजस्थान के सामने जीत के लिए 176 रनों का लक्ष्य था लेकिन वह आठ विकेट खोकर 167 रन बना सकी.
आखिरी ओवर में राजस्थान को जीत का परचम लहराने के लिए 12 रनों की ज़रूरत थी.
ब्रावो की पहली ही गेंद पर ख़तरनाक़ होते जा रहे बेन स्टोक्स का कैच सुरेश रैना ने अपने सुरक्षित हाथों में थाम लिया.
अब मैच चेन्नई की झोली में आ गया. स्टेडियम में ब्रावो-ब्रावो के शोर के बीच दूसरी गेंद पर नए बल्लेबाज़ श्रेयस गोपाल कोई रन नहीं बना सके.
तीसरी गेंद पर एक रन लेग बाई से बना. उसके बाद चौथी गेंद पर तो ब्रावो की यार्कर से ज्योफ्रा आर्चर का बल्ला ही टूट गया. वैसे इस बीच एक रन ज़रूर बना.
पांचवी गेंद पर श्रेयस गोपाल का ऊंचा शॉट इमरान ताहिर ने कैच में बदला और मैच भी चैन्नई के कब्ज़े में आ गया.
आखिरी गेंद पर आर्चर केवल एक रन बना सके. वह 11 गेंदों पर 24 रन बनाकर नाबाद रहे.
राजस्थान के लिए आर्चर के अलावा बेन स्टोक्स ने 46 और राहुल त्रिपाठी ने 39 रन बनाए.
चेन्नई की ओर से स्पिनर इमरान ताहिर ने 23 रन देकर दो और ड्वेन ब्रावो ने भी 32 रन देकर दो विकेट हासिल किए.
तीन मैच और तीनों में जीत हासिल कर फिलहाल चेन्नई अंकतालिका में सबसे ऊपर मौजूद है.
इससे पहले चेन्नई के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी टॉस भले ही हार गए लेकिन पहले बल्लेबाज़ी की दावत मिलने पर उन्होंने निर्धारित 20 ओवर में पांच विकेट खोकर 175 रन बनाए.
आईपीएल में अक्सर धोनी पर आरोप लगते रहते हैं कि वह बहुत नीचे बल्लेबाज़ी करने आते हैं और उनमें तेज़ी से रन बनाने की क्षमता नहीं रही.
लेकिन रविवार को तो धोनी ने सारे सवालों के जवाब देते हुए केवल 46 गेंदों पर चार चौके और चार छक्के लगाते हुए नाबाद 75 रन बनाए.
यह धोनी का चेन्नई में आईपीएल में बनाया गया सर्विधिक स्कोर है.
धोनी ने अपनी टीम को तब संभाला जब एक समय उनके चार विकेट केवल 88 रन पर गिर चुके थे.
धोनी ने साबित किया कि वह क्रीज़ के राजा है. एक बार उनका पांव अगर पिच पर जम तो वह अंगद के पांव जैसा हो जाता है.
कहां तो अंबाती रायडू, शेन वाटसन और केदार जाधव जिस पिच पर राजस्थान के गेंदबाज़ों को खेलने में नाकाम रहे वहीं उसी पिच पर धोनी ने साबित कर दिया कि पिच कोई भी हो उनके बल्ले को जवाब देना आता है.
धोनी के अपने पुराने साथी सुरेश रैना का भी ख़ूब साथ मिला. सुरेश रैना ने उपयोगी 36 रन बनाए. धोनी और रैना के बीच पांचवे विकेट के लिए बेहद महत्वपूर्ण 56 रनों की साझेदारी हुई.
रैना के आउट होने के बाद ड्वेन ब्रावो ने 16 गेंदों पर तेज़तर्रार 27 रन ठोककर चेन्नई को निर्धारित 20 ओवर में पांच विकेट पर 175 रन तक पहुंचने में मदद की.
वहीं इससे पहले रविवार को खेले गए दिन के पहले मुकाबले में सनराइजर्स हैदराबाद ने रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर को बुरी तरह हराया.
अपनी आक्रामकता के लिए जाने-जाने वाले कप्तान विराट कोहली की टीम को हैदराबाद के हाथों 118 रन से करारी मात का सामना करना पड़ा.
बैंगलोर के सामने जीत के लिए 232 रनों का विशाल लक्ष्य मिला था जिसके जवाब में वह मैच की एक गेंद शेष रहते 113 रनों पर ही ढेर हो गई.
गत चैंपियन चेन्नई ने रविवार को अपने ही घर में खेलते हुए राजस्थान रॉयल्स को आठ रन से हरा दिया.
राजस्थान के सामने जीत के लिए 176 रनों का लक्ष्य था लेकिन वह आठ विकेट खोकर 167 रन बना सकी.
आखिरी ओवर में राजस्थान को जीत का परचम लहराने के लिए 12 रनों की ज़रूरत थी.
ब्रावो की पहली ही गेंद पर ख़तरनाक़ होते जा रहे बेन स्टोक्स का कैच सुरेश रैना ने अपने सुरक्षित हाथों में थाम लिया.
अब मैच चेन्नई की झोली में आ गया. स्टेडियम में ब्रावो-ब्रावो के शोर के बीच दूसरी गेंद पर नए बल्लेबाज़ श्रेयस गोपाल कोई रन नहीं बना सके.
तीसरी गेंद पर एक रन लेग बाई से बना. उसके बाद चौथी गेंद पर तो ब्रावो की यार्कर से ज्योफ्रा आर्चर का बल्ला ही टूट गया. वैसे इस बीच एक रन ज़रूर बना.
पांचवी गेंद पर श्रेयस गोपाल का ऊंचा शॉट इमरान ताहिर ने कैच में बदला और मैच भी चैन्नई के कब्ज़े में आ गया.
आखिरी गेंद पर आर्चर केवल एक रन बना सके. वह 11 गेंदों पर 24 रन बनाकर नाबाद रहे.
राजस्थान के लिए आर्चर के अलावा बेन स्टोक्स ने 46 और राहुल त्रिपाठी ने 39 रन बनाए.
चेन्नई की ओर से स्पिनर इमरान ताहिर ने 23 रन देकर दो और ड्वेन ब्रावो ने भी 32 रन देकर दो विकेट हासिल किए.
तीन मैच और तीनों में जीत हासिल कर फिलहाल चेन्नई अंकतालिका में सबसे ऊपर मौजूद है.
इससे पहले चेन्नई के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी टॉस भले ही हार गए लेकिन पहले बल्लेबाज़ी की दावत मिलने पर उन्होंने निर्धारित 20 ओवर में पांच विकेट खोकर 175 रन बनाए.
आईपीएल में अक्सर धोनी पर आरोप लगते रहते हैं कि वह बहुत नीचे बल्लेबाज़ी करने आते हैं और उनमें तेज़ी से रन बनाने की क्षमता नहीं रही.
लेकिन रविवार को तो धोनी ने सारे सवालों के जवाब देते हुए केवल 46 गेंदों पर चार चौके और चार छक्के लगाते हुए नाबाद 75 रन बनाए.
यह धोनी का चेन्नई में आईपीएल में बनाया गया सर्विधिक स्कोर है.
धोनी ने अपनी टीम को तब संभाला जब एक समय उनके चार विकेट केवल 88 रन पर गिर चुके थे.
धोनी ने साबित किया कि वह क्रीज़ के राजा है. एक बार उनका पांव अगर पिच पर जम तो वह अंगद के पांव जैसा हो जाता है.
कहां तो अंबाती रायडू, शेन वाटसन और केदार जाधव जिस पिच पर राजस्थान के गेंदबाज़ों को खेलने में नाकाम रहे वहीं उसी पिच पर धोनी ने साबित कर दिया कि पिच कोई भी हो उनके बल्ले को जवाब देना आता है.
धोनी के अपने पुराने साथी सुरेश रैना का भी ख़ूब साथ मिला. सुरेश रैना ने उपयोगी 36 रन बनाए. धोनी और रैना के बीच पांचवे विकेट के लिए बेहद महत्वपूर्ण 56 रनों की साझेदारी हुई.
रैना के आउट होने के बाद ड्वेन ब्रावो ने 16 गेंदों पर तेज़तर्रार 27 रन ठोककर चेन्नई को निर्धारित 20 ओवर में पांच विकेट पर 175 रन तक पहुंचने में मदद की.
वहीं इससे पहले रविवार को खेले गए दिन के पहले मुकाबले में सनराइजर्स हैदराबाद ने रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर को बुरी तरह हराया.
अपनी आक्रामकता के लिए जाने-जाने वाले कप्तान विराट कोहली की टीम को हैदराबाद के हाथों 118 रन से करारी मात का सामना करना पड़ा.
बैंगलोर के सामने जीत के लिए 232 रनों का विशाल लक्ष्य मिला था जिसके जवाब में वह मैच की एक गेंद शेष रहते 113 रनों पर ही ढेर हो गई.
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