यूँ तो लालू प्रसाद यादव अपने बाथरूम में टूथ-पेस्ट से अपने दाँतों पर ब्रश किया करते थे, लेकिन जब वो लोगों से मिलने अपने बंगले के लॉन में आते थे, तो उनके हाथ में नीम की एक दातून होती थी.
ये उनके दाँतों के लिए तो अच्छी थी ही, उनकी छवि के लिए भी ग़ज़ब का काम करती थी. अपनी इस छवि के लिए लालू हमेशा बहुत सचेत रहते हैं.
अपनी वाक्पटुता और गंवई अंदाज़ से दर्शकों और श्रोताओं को हंसाते-हंसाते लोटपोट करने में लालू का कोई सानी नहीं है, लेकिन ये उनकी ख़ुद की बहुत क़रीने से बनाई गई छवि है, जिसके पीछे एक बहुत ही चतुर और प्रखर राजनीतिक दिमाग़ है.
'द मैरीगोल्ड स्टोरी- इंदिरा गाँधी एंड अदर्स' लिखने वाली कुमकुम चड्ढा बताती हैं, "लालू बेवक़ूफ़ नहीं हैं. राजनीतिक रूप से बहुत परिपक्व हैं. उनको पता है कि उन्हें क्या करना चाहिए, जिसका असर हो. वो मसखरे की अपनी छवि के कारण लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचते हैं.
कुमकुम चड्ढा कहती हैं, "वो एक 'स्टेट्समैन' तो क़तई नहीं हैं. शहरी लोगों के प्रति अपने विरोध को वो बहुत अच्छी तरह भुनाते हैं. अक्सर उनका पसंदीदा वाक्य होता है कि तुम दिल्ली वालों को कुछ पता नहीं है."
बिहार के किसी भी मुख्यमंत्री ने आज तक अपनी सरकार के चपरासी को दिए गए दो कमरों के सरकारी आवास से राज्य का शासन नहीं चलाया. न ही बिहार का कोई मुख्यमंत्री पटना मेडिकल कालेज में अपने बुख़ार में तप रहे बेटे का इलाज कराने आम लोगों की लाइन में खड़ा हुआ.
मशहूर पत्रकार संकर्षण ठाकुर अपनी किताब 'सबआल्टर्न साहेब- बिहार एंड द मेकिंग ऑफ़ लालू यादव' में लिखते हैं, "बिहार के एक सीनियर रिटार्यड अफ़सर ने मुझे बताया कि शुरू में लालू एक अनोखे प्राणी की तरह थे जो हर एक से टकराने की फ़िराक़ में रहता था. आप की समझ में ही नहीं आता था कि आप उन्हें विस्मय से देखते चले जाएँ या उन्हें रोकने के लिए कुछ करें. वो एक अजीब बोली बोलते थे, जिसमें हिंदी और भोजपुरी का मिश्रण रहता था. उसमें कहीं-कहीं ग़लत जगहों पर एकाध अंग्रेज़ी के लफ़्ज़ भी घुसा दिए जाते थे."
संकर्षण ठाकुर लिखते हैं, "ये चौंका देने वाली बात थी कि मुख्यमंत्री बन जाने के बाद भी वो अपने भाई के चपरासी वाले घर में रह रहे थे. हमने उनसे कहा भी कि इससे प्रशासनिक और सुरक्षा की दिक़्क़तें पैदा होंगी और वेटरिनरी कॉलेज में रहने वालों की ज़िंदगी भी मुश्किल हो जाएगी. लेकिन हर बार वो यही जवाब देते थे, हम चीफ़ मिनिस्टर हैं. हम सब जानते हैं. जैसा हम कहते हैं, वैसा कीजिए."
आम लोगों से लालू का 'कनेक्ट'
तमाम विवादों से जुड़े रहने के बावजूद लालू की लोकप्रियता का राज़ है, आम लोगों से उनका 'कनेक्ट.' याद कीजिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के शुरू के दिनों में लालू बिहार की जनता को सिखाया करते थे कि मशीन से किस तरह वोट किया जाता था.
एक बार वो बीबीसी दफ़्तर आए थे और हमारे बहुत इसरार पर उन्होंने अपने उस भाषण को याद किया था, "मैं लोगों को बताता था कि लालटेन के सामने उम्मीदवार का नाम लिखा होगा. लालटेन के ठीक सामने हारमोनियम की शक्ल जैसा बटन होगा. उसी बटन को अंगूठे की बग़ल वाली उंगली से 'पुश' करना है. कचकचा के इतनी ज़ोर से मत दबा देना कि मशीन टूट जाए. जब आपका सही वोट होगा तो मशीन जवाब दाबते के साथ बोलेगा पीईईई. अगर पी नहीं बोले तो समझो कुछ दाल में काला है."
लालू ने पहली बार जूता तब पहना था, जब उन्होंने एनसीसी की सदस्यता ली थी. कई सालों तक जूता न पहनने की वजह से उनके पैरों की उंगलियों के बीच ख़ासा 'गैप' पैदा हो गया था.
कुमकुम चड्ढा बताती हैं, "उनके एक पांव में नाख़ून नहीं थे. वो अक्सर दिखाते थे कि ये एक ग़रीब का पांव है. कई सालों तक उन्होंने जूता नहीं पहना. एक बार एक बैल भी उनके पैर पर चढ़ गया था. वो अपनी ग़रीबी को अपनी आस्तीन पर रख कर चलते थे. वो आज भी पैरों में चप्पल पहनते हैं. जब उनसे इसका कारण पूछा जाता है तो वो कहते हैं, जूता लगाने से दोनों पांव में 'हीट' पैदा होता है."
लालू की याददाश्त बहुत ग़ज़ब की है. एक बार वो जिससे मिल लेते हैं, उनका नाम और चेहरा कभी नहीं भूलते.
आरजेडी के वरिष्ठ नेता और एक ज़माने में लालू के विरोधी रहे शिवानंद तिवारी याद कहते हैं, "एक बार हम लालू के साथ एक पब्लिक मीटिंग में गए थे. वहाँ पर एक बड़ा सा लोहे वाला माइक लटका हुआ था. एक फटी दरी लगी हुई थी. 'ऑर्गनाइज़र' भी वहाँ से नदारद थे. नेता लोग अमूमन देर से पहुंचते हैं. हम लोग थोड़ा पहले पहुंच गए."
"जब हम वहाँ पहुंचे तो मुसहर लोगों के टोले में रहने वाले लोगों ने सबसे पहले हमें देखा. वो भागते हुए वहाँ पहुंचे. वहाँ मैंने नोट किया कि एक युवती लालू की नज़रों को पकड़ने की कोशिश कर रही है. उसके हाथ में एक बच्चा था. लालू ने उसको देखते ही पूछा, 'सुखमनी तुम यहाँ कैसे? तुम्हारी शादी यहीं हुई है क्या?' फिर लालू ने उसकी दूसरी बहन का नाम ले कर पूछा कि वो कहाँ है? उसने बताया कि बगल वाले गाँव में उसकी भी शादी हुई है. लालू ने तुरंत अपनी जेब से पाँच सौ रुपये का नोट निकाल कर उसे देते हुए कहा कि इससे बच्चे के लिए मिठाई वग़ैरह ख़रीद लेना."
शिवानंद तिवारी कहते हैं, "हम को बड़ा ताज्जुब हुआ कि एक ग़रीब औरत को लालू न सिर्फ़ नाम ले कर बुला रहे हैं, बल्कि उसकी बहन के बारे में भी पूछ रहे हैं. हमने उनसे पूछा कि ये कौन हैं? उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री बनने से पहले जब वो पटना के वेटरिनरी कॉलेज में रहा करते थे, तो ये महिला वहीं पास के मुसहर टोला में रहती थी. लालू यादव सालों गुज़र जाने के बाद भी उसे नहीं भूले थे. ये जो लालू यादव की शख़्सियत है, यही उस आदमी की ताक़त है."
Monday, February 25, 2019
Wednesday, February 20, 2019
पुलवामा: हमले के बाद कांग्रेस सकते में, बीजेपी जोश में क्यों?- ब्लॉग
ग्यारह फ़रवरी को कांग्रेस की पूर्वी उत्तर प्रदेश प्रभारी प्रियंका गांधी रोड शो कर रही थीं, राहुल गांधी हाथ में खिलौना लड़ाकू विमान लेकर जनता को मुद्दे की याद दिला रहे थे, कुछ लोग कह रहे थे कि 'हवा बदल रही है, बीजेपी दबाव में दिख रही है'.
इसके तीन दिन बाद 14 फ़रवरी को पुलवामा के हमले से पूरा देश सकते में आ गया, प्रियंका गांधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ़्रेंस यह कहते हुए रद्द कर दी कि 'ऐसे मौक़े पर राजनीति की बात करना ठीक नहीं है.'
हमले के बाद पूरा देश जिस तरह के सदमे में डूब गया, उससे कांग्रेस पार्टी शायद अभी तक नहीं उबर पाई है, जबकि बीजेपी पूरे जोश के साथ जल्दी ही चुनावी रंग में आ गई.
पुलवामा के हमले के बाद राहुल गांधी ने कहा कि उनकी पार्टी इस मामले में "सरकार के साथ है". यह सवाल कि इस हमले को रोकने की ज़िम्मेदारी किसकी थी? और इस हमले की टाइमिंग की बात करने की हिम्मत राहुल गांधी नहीं दिखा पाए, यह पहल करके ममता बनर्जी ने एक बार फिर बीजेपी-विरोधी गठबंधन का नेतृत्व हथिया लिया है.
अगर आप 14 फ़रवरी के बाद की राजनीतिक हलचलों को देखें तो आपको साफ़ दिखेगा बीजेपी पूरी सक्रियता के साथ चुनावी अभियान चला रही है जबकि कांग्रेस का पिछले हफ़्ते वाला जोश काफ़ूर है. कांग्रेस शायद रुककर देखना चाहती है कि पुलवामा कांड कैसे आगे बढ़ेगा, उसे यह भी दिख रहा है कि इस हमले के बाद लोगों में बहुत गुस्सा है जिसे अपने पक्ष में मोड़ने की कोई तरकीब उसे नहीं दिख रही है.
दूसरी ओर, बीजेपी बड़ी सहजता से देशभक्ति, सेना, राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, मोदी, वंदे मातरम, भारत माता की जय जैसे पुराने नारों पर लौट आई है. रोज़गार, विकास, राफ़ेल की बात अभी कोई सुनने को तैयार नहीं दिख रहा, ऐसे में कांग्रेस के पास बीजेपी के सुर में सुर मिलाने या चुप रहने के अलावा इस वक्त कोई और चारा भी नहीं है.
पंजाब में कांग्रेस के नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने सिर्फ़ इतना कहा था कि "आतंकवाद का कोई देश, मज़हब, ज़ात नहीं होता." इस पर उन्हें तीखे हमलों का सामना करना पड़ा है, उन्हें अकेले ही अपना बचाव करना पड़ा है, कांग्रेस का कोई नेता उनके बचाव में नहीं आया कि उन्होंने कोई ग़लत बात नहीं कही है.
गठबंधन, रैली और भाषण
मंगलवार को तमिलनाडु में बीजेपी और एआईडीएमके के गठबंधन का ऐलान किया गया, पलानीस्वामी और बीजेपी के वरिष्ठ नेता पीयूष गोयल ने प्रेस को संबोधित किया. तमिलनाडु में बीजेपी पांच लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी.
इससे पहले सोमवार को बीजेपी-शिव सेना ने काफ़ी तनातनी और रूठने-मनाने के खेल के बाद, गठबंधन में चुनाव लड़ने का ऐलान किया था. एक-दूसरे को पटकने और मुंह तोड़ने की धमकी देने वाले नेताओं ने एक-दूसरे का हाथ थामकर मुस्कुराते हुए फ़ोटो खिंचाए. महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों में से बीजेपी 25 और शिव सेना 23 सीटों पर चुनाव लड़ेगी.
अमित शाह और पीयूष गोयल जहां पूरी सक्रियता के साथ राजनीतिक गतिविधियों में जुटे दिखे, वहीं प्रियंका गांधी और राहुल गांधी, अखिलेश, मायावती या दूसरे विपक्षी नेता भी चुप बैठे ही नज़र आ रहे हैं.
प्रधानमंत्री मोदी उत्तर प्रदेश में झांसी में, महाराष्ट्र में धुले में और बिहार में बरौनी में जनसभाओं को संबोधित कर चुके हैं और 'वंदे भारत' सहित कई परियोजनाओं का उदघाटन और शिलान्यास भी किया है. पुलवामा पर राजनीति न करने की बात करने वाली बीजेपी के वरिष्ठ नेता और रेल मंत्री ने कहा कि यह ट्रेन "आतंकवादियों को जवाब है." इसी तरह पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने असम में चुनावी सभा को संबोधित किया, पुलवामा हमले का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, "यह यूपीए की सरकार नहीं है."
चुनावी सभाओं का सिलसिला जारी रखते हुए बुधवार को यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ओड़िसा के पिछड़े ज़िले कालाहांडी में 'आतंकवाद के ख़िलाफ़ सिंह गर्जना' करेंगे.
जिस शाम पुलवामा से मरने वाले सैनिकों की बढ़ती तादाद की ख़बर आ रही थी, उस शाम दिल्ली बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी प्रयागराज में बीजेपी के लिए न सिर्फ़ वोट माँग रहे थे बल्कि संगीत का कार्यक्रम भी कर रहे थे, जिसके लिए उनकी आलोचना हुई है.
राहुल गांधी ने पुलवामा के हमले के बाद छत्तीसगढ़ में एक जनसभा को संबोधित किया और बीजेपी छोड़कर आए कीर्ति आज़ाद का पार्टी में स्वागत किया, इसके अलावा राजनीतिक तौर पर वे चुप्पी साधे हुए दिख रहे हैं. प्रियंका गांधी पुलवामा की घटना के बाद लोगों से मिल-जुल तो रही हैं लेकिन उन्होंने मंच से या प्रेस से कुछ कहने का जोखिम नहीं लिया.
14 फ़रवरी से पहले तक बीजेपी विपक्ष को हमलों पर पटलवार करते हुए विकास की बात कर रही थी, विश्व हिंदू परिषद और संघ ने पहले ही ऐलान कर दिया था कि राम मंदिर पर चुनाव हो जाने तक कोई आंदोलन नहीं होगा.
पांच दिन पहले तक लग रहा था कि 2019 के आम चुनाव का एजेंडा सेट करने की पहल विपक्ष ने ले ली है, लेकिन पुलवामा हमले के बाद बीजेपी आक्रामक तेवर दिखा रही है क्योंकि पाकिस्तान के ख़िलाफ़ देशभक्ति की बातें करने का उसका ट्रैक रिकॉर्ड काफ़ी अच्छा है, पार्टी देशभक्ति को हिंदुत्व का पर्यायवाची शब्द बनाने में कामयाब हो गई है. दूसरी तरफ़, पाकिस्तान, मुसलमान, कश्मीरी, देशद्रोही वगैरह भी ज़रूरत के हिसाब से आसानी से बदलकर इस्तेमाल किए रहे हैं.
ऐसे माहौल में विपक्ष को अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना होगा, पुलवामा का मामला इतनी आसानी से ठंडा नहीं होने वाला है, किसी जवाबी कार्रवाई को बीजेपी अपने नेतृत्व की कामयाबी के तौर पर पेश करने से नहीं हिचकेगी. ऐसी हालत में चुनाव से पहले किसी तरह की टिप्पणी भी विपक्ष के लिए मुश्किल होगी, आपको याद होगा उड़ी के हमले के बाद हुए 'सर्जिकल स्ट्राइक' पर सवाल करने वाले अरविंद केजरीवाल को कितनी कटुता का सामना करना पड़ा था.
इसके तीन दिन बाद 14 फ़रवरी को पुलवामा के हमले से पूरा देश सकते में आ गया, प्रियंका गांधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ़्रेंस यह कहते हुए रद्द कर दी कि 'ऐसे मौक़े पर राजनीति की बात करना ठीक नहीं है.'
हमले के बाद पूरा देश जिस तरह के सदमे में डूब गया, उससे कांग्रेस पार्टी शायद अभी तक नहीं उबर पाई है, जबकि बीजेपी पूरे जोश के साथ जल्दी ही चुनावी रंग में आ गई.
पुलवामा के हमले के बाद राहुल गांधी ने कहा कि उनकी पार्टी इस मामले में "सरकार के साथ है". यह सवाल कि इस हमले को रोकने की ज़िम्मेदारी किसकी थी? और इस हमले की टाइमिंग की बात करने की हिम्मत राहुल गांधी नहीं दिखा पाए, यह पहल करके ममता बनर्जी ने एक बार फिर बीजेपी-विरोधी गठबंधन का नेतृत्व हथिया लिया है.
अगर आप 14 फ़रवरी के बाद की राजनीतिक हलचलों को देखें तो आपको साफ़ दिखेगा बीजेपी पूरी सक्रियता के साथ चुनावी अभियान चला रही है जबकि कांग्रेस का पिछले हफ़्ते वाला जोश काफ़ूर है. कांग्रेस शायद रुककर देखना चाहती है कि पुलवामा कांड कैसे आगे बढ़ेगा, उसे यह भी दिख रहा है कि इस हमले के बाद लोगों में बहुत गुस्सा है जिसे अपने पक्ष में मोड़ने की कोई तरकीब उसे नहीं दिख रही है.
दूसरी ओर, बीजेपी बड़ी सहजता से देशभक्ति, सेना, राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, मोदी, वंदे मातरम, भारत माता की जय जैसे पुराने नारों पर लौट आई है. रोज़गार, विकास, राफ़ेल की बात अभी कोई सुनने को तैयार नहीं दिख रहा, ऐसे में कांग्रेस के पास बीजेपी के सुर में सुर मिलाने या चुप रहने के अलावा इस वक्त कोई और चारा भी नहीं है.
पंजाब में कांग्रेस के नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने सिर्फ़ इतना कहा था कि "आतंकवाद का कोई देश, मज़हब, ज़ात नहीं होता." इस पर उन्हें तीखे हमलों का सामना करना पड़ा है, उन्हें अकेले ही अपना बचाव करना पड़ा है, कांग्रेस का कोई नेता उनके बचाव में नहीं आया कि उन्होंने कोई ग़लत बात नहीं कही है.
गठबंधन, रैली और भाषण
मंगलवार को तमिलनाडु में बीजेपी और एआईडीएमके के गठबंधन का ऐलान किया गया, पलानीस्वामी और बीजेपी के वरिष्ठ नेता पीयूष गोयल ने प्रेस को संबोधित किया. तमिलनाडु में बीजेपी पांच लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी.
इससे पहले सोमवार को बीजेपी-शिव सेना ने काफ़ी तनातनी और रूठने-मनाने के खेल के बाद, गठबंधन में चुनाव लड़ने का ऐलान किया था. एक-दूसरे को पटकने और मुंह तोड़ने की धमकी देने वाले नेताओं ने एक-दूसरे का हाथ थामकर मुस्कुराते हुए फ़ोटो खिंचाए. महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों में से बीजेपी 25 और शिव सेना 23 सीटों पर चुनाव लड़ेगी.
अमित शाह और पीयूष गोयल जहां पूरी सक्रियता के साथ राजनीतिक गतिविधियों में जुटे दिखे, वहीं प्रियंका गांधी और राहुल गांधी, अखिलेश, मायावती या दूसरे विपक्षी नेता भी चुप बैठे ही नज़र आ रहे हैं.
प्रधानमंत्री मोदी उत्तर प्रदेश में झांसी में, महाराष्ट्र में धुले में और बिहार में बरौनी में जनसभाओं को संबोधित कर चुके हैं और 'वंदे भारत' सहित कई परियोजनाओं का उदघाटन और शिलान्यास भी किया है. पुलवामा पर राजनीति न करने की बात करने वाली बीजेपी के वरिष्ठ नेता और रेल मंत्री ने कहा कि यह ट्रेन "आतंकवादियों को जवाब है." इसी तरह पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने असम में चुनावी सभा को संबोधित किया, पुलवामा हमले का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, "यह यूपीए की सरकार नहीं है."
चुनावी सभाओं का सिलसिला जारी रखते हुए बुधवार को यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ओड़िसा के पिछड़े ज़िले कालाहांडी में 'आतंकवाद के ख़िलाफ़ सिंह गर्जना' करेंगे.
जिस शाम पुलवामा से मरने वाले सैनिकों की बढ़ती तादाद की ख़बर आ रही थी, उस शाम दिल्ली बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी प्रयागराज में बीजेपी के लिए न सिर्फ़ वोट माँग रहे थे बल्कि संगीत का कार्यक्रम भी कर रहे थे, जिसके लिए उनकी आलोचना हुई है.
राहुल गांधी ने पुलवामा के हमले के बाद छत्तीसगढ़ में एक जनसभा को संबोधित किया और बीजेपी छोड़कर आए कीर्ति आज़ाद का पार्टी में स्वागत किया, इसके अलावा राजनीतिक तौर पर वे चुप्पी साधे हुए दिख रहे हैं. प्रियंका गांधी पुलवामा की घटना के बाद लोगों से मिल-जुल तो रही हैं लेकिन उन्होंने मंच से या प्रेस से कुछ कहने का जोखिम नहीं लिया.
14 फ़रवरी से पहले तक बीजेपी विपक्ष को हमलों पर पटलवार करते हुए विकास की बात कर रही थी, विश्व हिंदू परिषद और संघ ने पहले ही ऐलान कर दिया था कि राम मंदिर पर चुनाव हो जाने तक कोई आंदोलन नहीं होगा.
पांच दिन पहले तक लग रहा था कि 2019 के आम चुनाव का एजेंडा सेट करने की पहल विपक्ष ने ले ली है, लेकिन पुलवामा हमले के बाद बीजेपी आक्रामक तेवर दिखा रही है क्योंकि पाकिस्तान के ख़िलाफ़ देशभक्ति की बातें करने का उसका ट्रैक रिकॉर्ड काफ़ी अच्छा है, पार्टी देशभक्ति को हिंदुत्व का पर्यायवाची शब्द बनाने में कामयाब हो गई है. दूसरी तरफ़, पाकिस्तान, मुसलमान, कश्मीरी, देशद्रोही वगैरह भी ज़रूरत के हिसाब से आसानी से बदलकर इस्तेमाल किए रहे हैं.
ऐसे माहौल में विपक्ष को अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना होगा, पुलवामा का मामला इतनी आसानी से ठंडा नहीं होने वाला है, किसी जवाबी कार्रवाई को बीजेपी अपने नेतृत्व की कामयाबी के तौर पर पेश करने से नहीं हिचकेगी. ऐसी हालत में चुनाव से पहले किसी तरह की टिप्पणी भी विपक्ष के लिए मुश्किल होगी, आपको याद होगा उड़ी के हमले के बाद हुए 'सर्जिकल स्ट्राइक' पर सवाल करने वाले अरविंद केजरीवाल को कितनी कटुता का सामना करना पड़ा था.
Wednesday, February 13, 2019
आत्मघाती बम हमले में 20 रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स की मौत
हमलावर ने सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में ख़ाश-ज़हेदान सड़क पर रिवॉल्यूशनरी गार्ड को ले जा रही बस को निशाना बनाया.
इरना समाचार एजेंसी ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि इस घटना में 20 अन्य गार्ड ज़ख़्मी हुए हैं.
सुन्नी मुस्लिम चरमपंथी समूह जैश अल-अद्ल (इंसाफ़ की सेना) ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली है.
जैश अल-अद्ल समूह ने 2012 में यह कहते हुए हथियार उठाए थे कि वह ईरान के सुन्नियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ेगा. संगठन का आरोप है कि देश का शिया तंत्र सुन्नियों के साथ भेदभाव करता है.
इस समूह ने हाल ही में सिस्तान-बलूचिस्तान में कई हमले किए हैं. इस इलाके में सुन्नी बलूची समुदाय की आबादी ज़्यादा है.
रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स की दक्षिण-पूर्वी शाखा की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि बुधवार को जिस समय एक यूनिट पाकिस्तान के साथ लगती सीमा से वापस लौट रही थी, उसी समय उनकी बस के बगल में विस्फोटकों से भरी कार में धमाका हो गया.
ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड इतने ताक़तवर क्यों?
अमरीका के डर से ईरान को अलविदा कहने वाली कंपनियां
इस बयान में नुकसान के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है मगर 'तकफ़ीरी चरमपंथियों और कुछ प्रमुख शक्तियों की ख़ुफ़िया एजेंसियों के किराये के लड़ाकों' को ज़िम्मेदार ठहराया गया है. तकफ़ीरी शब्द को उन सुन्नी चरमपंथियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो अन्य मुसलमानों को मुसलमान नहीं समझते.
बयान में यह नहीं बताया है कि प्रमुख शक्तियों का मतलब क्या है मगर ईरान के विदेश मंत्रालय ने इस घटना को पोलैंड के वॉरसा में अमरीका के नेतृत्व में मध्य पूर्व पर चल रहे सम्मेलन से जोड़ा है. इस सम्मेलन में ईरान की गतिविधियों पर भी बात होनी है.
विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ ने ट्वीट करके कहा, "वॉरसा में सर्कस शुरू होने वाले दिन ही ईरान पर आतंकवादी हमला होना महज संयोग नहीं है."
इससे पहले इसी महीने जैश अल-अद्ल को निक शहर में अर्धसैनिक बलों के अड्डे पर हमले के लिए भी ज़िम्मेदार बताया गया था. उस हमले में एक रिवॉल्यूशनरी गार्ड की मौत हो गई थी और पांच ज़ख़्मी हो गए थे.
इसके बाद भी इस संगठन ने कुछ हमलों की ज़िम्मेदारी ली थी मगर बुधवार को हुआ हमला पिछले साल सितंबर में हुए हमले के बाद का सबसे बड़ा हमला है. उस समय अहवाज़ शहर में सैन्य परेड के दौरान एक बंदूकधारी ने 24 लोगों की जान ले ली थी.
उस समय जिहादी समूह इस्लामिक स्टेट और ईरान के अरब अलगाववादियों ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली थी मगर कोई भी अपने दावे के पक्ष में सबूत पेश नहीं कर पाया था.
इरना समाचार एजेंसी ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि इस घटना में 20 अन्य गार्ड ज़ख़्मी हुए हैं.
सुन्नी मुस्लिम चरमपंथी समूह जैश अल-अद्ल (इंसाफ़ की सेना) ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली है.
जैश अल-अद्ल समूह ने 2012 में यह कहते हुए हथियार उठाए थे कि वह ईरान के सुन्नियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ेगा. संगठन का आरोप है कि देश का शिया तंत्र सुन्नियों के साथ भेदभाव करता है.
इस समूह ने हाल ही में सिस्तान-बलूचिस्तान में कई हमले किए हैं. इस इलाके में सुन्नी बलूची समुदाय की आबादी ज़्यादा है.
रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स की दक्षिण-पूर्वी शाखा की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि बुधवार को जिस समय एक यूनिट पाकिस्तान के साथ लगती सीमा से वापस लौट रही थी, उसी समय उनकी बस के बगल में विस्फोटकों से भरी कार में धमाका हो गया.
ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड इतने ताक़तवर क्यों?
अमरीका के डर से ईरान को अलविदा कहने वाली कंपनियां
इस बयान में नुकसान के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है मगर 'तकफ़ीरी चरमपंथियों और कुछ प्रमुख शक्तियों की ख़ुफ़िया एजेंसियों के किराये के लड़ाकों' को ज़िम्मेदार ठहराया गया है. तकफ़ीरी शब्द को उन सुन्नी चरमपंथियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो अन्य मुसलमानों को मुसलमान नहीं समझते.
बयान में यह नहीं बताया है कि प्रमुख शक्तियों का मतलब क्या है मगर ईरान के विदेश मंत्रालय ने इस घटना को पोलैंड के वॉरसा में अमरीका के नेतृत्व में मध्य पूर्व पर चल रहे सम्मेलन से जोड़ा है. इस सम्मेलन में ईरान की गतिविधियों पर भी बात होनी है.
विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ ने ट्वीट करके कहा, "वॉरसा में सर्कस शुरू होने वाले दिन ही ईरान पर आतंकवादी हमला होना महज संयोग नहीं है."
इससे पहले इसी महीने जैश अल-अद्ल को निक शहर में अर्धसैनिक बलों के अड्डे पर हमले के लिए भी ज़िम्मेदार बताया गया था. उस हमले में एक रिवॉल्यूशनरी गार्ड की मौत हो गई थी और पांच ज़ख़्मी हो गए थे.
इसके बाद भी इस संगठन ने कुछ हमलों की ज़िम्मेदारी ली थी मगर बुधवार को हुआ हमला पिछले साल सितंबर में हुए हमले के बाद का सबसे बड़ा हमला है. उस समय अहवाज़ शहर में सैन्य परेड के दौरान एक बंदूकधारी ने 24 लोगों की जान ले ली थी.
उस समय जिहादी समूह इस्लामिक स्टेट और ईरान के अरब अलगाववादियों ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली थी मगर कोई भी अपने दावे के पक्ष में सबूत पेश नहीं कर पाया था.
Wednesday, February 6, 2019
वो समलैंगिक थीं और शादी करना चाहती थीं, फिर क्या हुआ
स्वीटी की तलाश में साहिल (राजकुमार राव) पंजाब के एक कस्बे तक पहुंचता है. पंजाब तक पहुंचते हुए स्वीटी के शब्दों को दोहराता रहता है - "ट्रू लव के रास्ते में कोई ना कोई स्यापा होता ही है. नहीं तो लव स्टोरी में फील कैसे आएगी."
साहिल कई फ़िल्मी करतब करके स्वीटी तक पहुंचता है. लेकिन जब स्वीटी उसे अपने मन की बात बताती है तो फ़िल्म की दिशा एक नया मोड़ ले लेती है.
हाल ही में रिलीज़ हुई हिंदी फ़िल्म 'एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा' समलैंगिक रिश्ते पर आधारित है.
हाल के वर्षों में भारतीय समलैंगिक पुरुष, ट्रांसजेंडर व्यक्ति आगे आकर अपनी आवाज़ें बुलंद करके अपनी चिंताएं जाहिर कर रहे हैं.
लेकिन तुलनात्मक रूप से समलैंगिक महिलाएं आज़ादी से अपने आपको ज़ाहिर करते हुए नहीं दिख रही हैं.
इस फ़िल्म के रिलीज़ होने के बाद हमने एक ऐसी लड़की से बात की जिसे एक दूसरी लड़की से मोहब्बत हुई थी.
प्रिया और रश्मि की कहानी फ़िल्मी कहानियों के मुक़ाबले कम नाटकीय नहीं है. (लड़कियों की पहचान गुप्त रखने के लिए इस लेख में उनके नाम बदल दिए गए हैं.)
प्रिया और रश्मि की कहानी पढ़िए रश्मि की ज़ुबानी
अब इस बात को तीन साल बीत चुके हैं. आम तौर पर दो लोग किसी शादी या कहीं घूमते हुए मिलते हैं और उन्हें एक दूसरे से प्यार हो जाता है.
लेकिन मुझे उससे अपने ही गांव में प्यार हुआ. जब मेरी दादी की मौत हुई तो सभी लोग घर में जमा थे. मैं उसे काफ़ी पहले से जानती थी. उसे पसंद भी करती थी. उसका नाम प्रिया है. वह मेरी कज़िन सिस्टर यानी मेरी बुआ की बेटी है.
जब कोई पूछता है कि तुम्हें उसके लिए क्या महसूस होता था, तो मुझे हंसी आ जाती है. मुझे उसके लिए वही सब महसूस होता था जो किसी भी प्यार में पड़ने वाले को होता है.
अपने आस-पास और फिल्मों में मैंने हमेशा एक लड़के और लड़की को प्यार करते हुए देखा. मुझे पता था कि मैं कुछ अलग हूं. जब मैंने इंटरनेट पर सर्च किया तो मुझे पता चला कि मैं एकदम नॉर्मल हूं.
15 साल की उम्र में मर्ज़ी के ख़िलाफ़ मेरी शादी कर दी गई. वो शादी टूट गई और जब तक मैं वयस्क हुई मेरा तलाक़ हो चुका था.
पुरुषों की ओर मैं कभी आकर्षित हुई ही नहीं. लेकिन प्रिया के लिए मेरे मन में वैसी भावनाएं थीं. जब मैंने उसे प्रपोज़ किया तो उसने कहा कि वो भी मेरे बारे में ऐसा ही सोचती है.
उसका पहला सवाल था, "अगर हमारे परिवार वालों और रिश्तेदारों को हमारे रिश्ते के बारे में बता चलेगा, तो क्या वो इसे स्वीकार करेंगे?"
मैंने उससे कहा, "रिश्तेदारों के बारे में मुझे नहीं पता, लेकिन अगर तुम मुझसे सच में प्यार करती हो, तो चलो शादी कर लेते हैं और एक साथ रहना शुरू करते हैं."
प्रिया तेलंगाना में रहती थीं और मैं मुंबई में थी. अगले छह महीने तक हम लगातार एक दूसरे से बात करते रहे.
वो कॉलेज में पढ़ रही थी और मेरी पढ़ाई शादी से पहले ही रोक दी गई थी. तलाक़ के बाद मैं छोटी-मोटी नौकरी कर रही थी.
मुझे जब भी वक्त मिलता, मैं छुट्टी लेकर उसके घर उससे मिलने जाया करती थी. मेरे घरवाले पूछते थे, "तुम बुआ के घर इतना क्यों जाती हो?"
मैं प्यार में पागल थी. मैंने घरवालों की बातों को कभी गंभीरता से नहीं लिया और किसी ना किसी बहाने से बुआ के घर जाती रही.
लेकिन बुआ के परिवार वालों को शक होने लगा था और वो मुझे मुंबई वापस लौट जाने के लिए कहते. लेकिन प्रिया मुझे वहीं रुकने के लिए कह देती. उसके कहने पर फिर मैं वहीं रुक जाती थी.
एक बार ऐसे ही मैं उससे मिलने गई हुई थी और हमने गांव के महालक्ष्मी मंदिर में चोरी-छुपे शादी कर ली. मैंने उसे मंगलसूत्र बांधा और भगवान की मौजूदगी में इस रिश्ते की शुरुआत की.
हम शादी के बाद साथ रहने का फ़ैसला कर चुके थे. दरअसल मैं धूम-धाम से शादी करना चाहती थी, लेकिन ये आसान नहीं था या कहें कि नामुमकिन था.
साहिल कई फ़िल्मी करतब करके स्वीटी तक पहुंचता है. लेकिन जब स्वीटी उसे अपने मन की बात बताती है तो फ़िल्म की दिशा एक नया मोड़ ले लेती है.
हाल ही में रिलीज़ हुई हिंदी फ़िल्म 'एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा' समलैंगिक रिश्ते पर आधारित है.
हाल के वर्षों में भारतीय समलैंगिक पुरुष, ट्रांसजेंडर व्यक्ति आगे आकर अपनी आवाज़ें बुलंद करके अपनी चिंताएं जाहिर कर रहे हैं.
लेकिन तुलनात्मक रूप से समलैंगिक महिलाएं आज़ादी से अपने आपको ज़ाहिर करते हुए नहीं दिख रही हैं.
इस फ़िल्म के रिलीज़ होने के बाद हमने एक ऐसी लड़की से बात की जिसे एक दूसरी लड़की से मोहब्बत हुई थी.
प्रिया और रश्मि की कहानी फ़िल्मी कहानियों के मुक़ाबले कम नाटकीय नहीं है. (लड़कियों की पहचान गुप्त रखने के लिए इस लेख में उनके नाम बदल दिए गए हैं.)
प्रिया और रश्मि की कहानी पढ़िए रश्मि की ज़ुबानी
अब इस बात को तीन साल बीत चुके हैं. आम तौर पर दो लोग किसी शादी या कहीं घूमते हुए मिलते हैं और उन्हें एक दूसरे से प्यार हो जाता है.
लेकिन मुझे उससे अपने ही गांव में प्यार हुआ. जब मेरी दादी की मौत हुई तो सभी लोग घर में जमा थे. मैं उसे काफ़ी पहले से जानती थी. उसे पसंद भी करती थी. उसका नाम प्रिया है. वह मेरी कज़िन सिस्टर यानी मेरी बुआ की बेटी है.
जब कोई पूछता है कि तुम्हें उसके लिए क्या महसूस होता था, तो मुझे हंसी आ जाती है. मुझे उसके लिए वही सब महसूस होता था जो किसी भी प्यार में पड़ने वाले को होता है.
अपने आस-पास और फिल्मों में मैंने हमेशा एक लड़के और लड़की को प्यार करते हुए देखा. मुझे पता था कि मैं कुछ अलग हूं. जब मैंने इंटरनेट पर सर्च किया तो मुझे पता चला कि मैं एकदम नॉर्मल हूं.
15 साल की उम्र में मर्ज़ी के ख़िलाफ़ मेरी शादी कर दी गई. वो शादी टूट गई और जब तक मैं वयस्क हुई मेरा तलाक़ हो चुका था.
पुरुषों की ओर मैं कभी आकर्षित हुई ही नहीं. लेकिन प्रिया के लिए मेरे मन में वैसी भावनाएं थीं. जब मैंने उसे प्रपोज़ किया तो उसने कहा कि वो भी मेरे बारे में ऐसा ही सोचती है.
उसका पहला सवाल था, "अगर हमारे परिवार वालों और रिश्तेदारों को हमारे रिश्ते के बारे में बता चलेगा, तो क्या वो इसे स्वीकार करेंगे?"
मैंने उससे कहा, "रिश्तेदारों के बारे में मुझे नहीं पता, लेकिन अगर तुम मुझसे सच में प्यार करती हो, तो चलो शादी कर लेते हैं और एक साथ रहना शुरू करते हैं."
प्रिया तेलंगाना में रहती थीं और मैं मुंबई में थी. अगले छह महीने तक हम लगातार एक दूसरे से बात करते रहे.
वो कॉलेज में पढ़ रही थी और मेरी पढ़ाई शादी से पहले ही रोक दी गई थी. तलाक़ के बाद मैं छोटी-मोटी नौकरी कर रही थी.
मुझे जब भी वक्त मिलता, मैं छुट्टी लेकर उसके घर उससे मिलने जाया करती थी. मेरे घरवाले पूछते थे, "तुम बुआ के घर इतना क्यों जाती हो?"
मैं प्यार में पागल थी. मैंने घरवालों की बातों को कभी गंभीरता से नहीं लिया और किसी ना किसी बहाने से बुआ के घर जाती रही.
लेकिन बुआ के परिवार वालों को शक होने लगा था और वो मुझे मुंबई वापस लौट जाने के लिए कहते. लेकिन प्रिया मुझे वहीं रुकने के लिए कह देती. उसके कहने पर फिर मैं वहीं रुक जाती थी.
एक बार ऐसे ही मैं उससे मिलने गई हुई थी और हमने गांव के महालक्ष्मी मंदिर में चोरी-छुपे शादी कर ली. मैंने उसे मंगलसूत्र बांधा और भगवान की मौजूदगी में इस रिश्ते की शुरुआत की.
हम शादी के बाद साथ रहने का फ़ैसला कर चुके थे. दरअसल मैं धूम-धाम से शादी करना चाहती थी, लेकिन ये आसान नहीं था या कहें कि नामुमकिन था.
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