स्वीटी की तलाश में साहिल (राजकुमार राव) पंजाब के एक कस्बे तक पहुंचता है. पंजाब तक पहुंचते हुए स्वीटी के शब्दों को दोहराता रहता है - "ट्रू लव के रास्ते में कोई ना कोई स्यापा होता ही है. नहीं तो लव स्टोरी में फील कैसे आएगी."
साहिल कई फ़िल्मी करतब करके स्वीटी तक पहुंचता है. लेकिन जब स्वीटी उसे अपने मन की बात बताती है तो फ़िल्म की दिशा एक नया मोड़ ले लेती है.
हाल ही में रिलीज़ हुई हिंदी फ़िल्म 'एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा' समलैंगिक रिश्ते पर आधारित है.
हाल के वर्षों में भारतीय समलैंगिक पुरुष, ट्रांसजेंडर व्यक्ति आगे आकर अपनी आवाज़ें बुलंद करके अपनी चिंताएं जाहिर कर रहे हैं.
लेकिन तुलनात्मक रूप से समलैंगिक महिलाएं आज़ादी से अपने आपको ज़ाहिर करते हुए नहीं दिख रही हैं.
इस फ़िल्म के रिलीज़ होने के बाद हमने एक ऐसी लड़की से बात की जिसे एक दूसरी लड़की से मोहब्बत हुई थी.
प्रिया और रश्मि की कहानी फ़िल्मी कहानियों के मुक़ाबले कम नाटकीय नहीं है. (लड़कियों की पहचान गुप्त रखने के लिए इस लेख में उनके नाम बदल दिए गए हैं.)
प्रिया और रश्मि की कहानी पढ़िए रश्मि की ज़ुबानी
अब इस बात को तीन साल बीत चुके हैं. आम तौर पर दो लोग किसी शादी या कहीं घूमते हुए मिलते हैं और उन्हें एक दूसरे से प्यार हो जाता है.
लेकिन मुझे उससे अपने ही गांव में प्यार हुआ. जब मेरी दादी की मौत हुई तो सभी लोग घर में जमा थे. मैं उसे काफ़ी पहले से जानती थी. उसे पसंद भी करती थी. उसका नाम प्रिया है. वह मेरी कज़िन सिस्टर यानी मेरी बुआ की बेटी है.
जब कोई पूछता है कि तुम्हें उसके लिए क्या महसूस होता था, तो मुझे हंसी आ जाती है. मुझे उसके लिए वही सब महसूस होता था जो किसी भी प्यार में पड़ने वाले को होता है.
अपने आस-पास और फिल्मों में मैंने हमेशा एक लड़के और लड़की को प्यार करते हुए देखा. मुझे पता था कि मैं कुछ अलग हूं. जब मैंने इंटरनेट पर सर्च किया तो मुझे पता चला कि मैं एकदम नॉर्मल हूं.
15 साल की उम्र में मर्ज़ी के ख़िलाफ़ मेरी शादी कर दी गई. वो शादी टूट गई और जब तक मैं वयस्क हुई मेरा तलाक़ हो चुका था.
पुरुषों की ओर मैं कभी आकर्षित हुई ही नहीं. लेकिन प्रिया के लिए मेरे मन में वैसी भावनाएं थीं. जब मैंने उसे प्रपोज़ किया तो उसने कहा कि वो भी मेरे बारे में ऐसा ही सोचती है.
उसका पहला सवाल था, "अगर हमारे परिवार वालों और रिश्तेदारों को हमारे रिश्ते के बारे में बता चलेगा, तो क्या वो इसे स्वीकार करेंगे?"
मैंने उससे कहा, "रिश्तेदारों के बारे में मुझे नहीं पता, लेकिन अगर तुम मुझसे सच में प्यार करती हो, तो चलो शादी कर लेते हैं और एक साथ रहना शुरू करते हैं."
प्रिया तेलंगाना में रहती थीं और मैं मुंबई में थी. अगले छह महीने तक हम लगातार एक दूसरे से बात करते रहे.
वो कॉलेज में पढ़ रही थी और मेरी पढ़ाई शादी से पहले ही रोक दी गई थी. तलाक़ के बाद मैं छोटी-मोटी नौकरी कर रही थी.
मुझे जब भी वक्त मिलता, मैं छुट्टी लेकर उसके घर उससे मिलने जाया करती थी. मेरे घरवाले पूछते थे, "तुम बुआ के घर इतना क्यों जाती हो?"
मैं प्यार में पागल थी. मैंने घरवालों की बातों को कभी गंभीरता से नहीं लिया और किसी ना किसी बहाने से बुआ के घर जाती रही.
लेकिन बुआ के परिवार वालों को शक होने लगा था और वो मुझे मुंबई वापस लौट जाने के लिए कहते. लेकिन प्रिया मुझे वहीं रुकने के लिए कह देती. उसके कहने पर फिर मैं वहीं रुक जाती थी.
एक बार ऐसे ही मैं उससे मिलने गई हुई थी और हमने गांव के महालक्ष्मी मंदिर में चोरी-छुपे शादी कर ली. मैंने उसे मंगलसूत्र बांधा और भगवान की मौजूदगी में इस रिश्ते की शुरुआत की.
हम शादी के बाद साथ रहने का फ़ैसला कर चुके थे. दरअसल मैं धूम-धाम से शादी करना चाहती थी, लेकिन ये आसान नहीं था या कहें कि नामुमकिन था.
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